स्वामी वाणी पुष्प ५३२(पर्व ४ थे भाग ३६)
आजचे चिंतन-मनन
श्री स्वामी समर्थ म्हणजे असे ‘नशीब’
..जे भेटते ‘पुण्याईने’ !!
श्री स्वामी समर्थ म्हणजे असे ‘पुण्य’
..ज्याने ‘नशीब’ बदलले आमुचे !!
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हर साल हम पितृ पूजा करते है.. हमारी संस्कृति में साल में १६ दिन हमारे पूर्वजों की पूजा के लिए दिए है.. यह हमारे पूर्वजों के प्रति सदभावना व्यक्त करने का दिन... सचमें हमारे पूर्वजोंने कितना विचार पूर्वक यह सब बनाए है..सचमें यह सब देखने के बाद गर्व होता है.. लेकिन कुछ...
भाई और बहनो आप सभी को नमस्कार ! हम सभी लोग अभी श्री गणपति बाप्पा और साथ में कुछ लोग श्री महालक्ष्मी की भी पूजा कर रहे... सभी तरफ खुशियों का वातावरण है... या सभी पूजा पाठ जब देखता हु... उसके पीछे अपने पूर्वजों की जो धारणा थी बहोत ऊँची थी... गणपति के साथ... श्री...
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन इनका जन्म ५ सितम्बर १८८८ को तिरुत्तनी गांव जो चित्तोर जिल्हे में तमिळनाडू राज्य में हुवा था | उन्होंने अपनी शिक्षा दर्शनशास्त्र में M.A. किया | उन्होंने शिक्षा पूरी होने के बाद साहयक प्रोफेसर का काम मद्रास प्रेसि डेंसी कॉलेज में और बाद में...
गजाजन महाराज बोल रहे है - यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रम्ह व्याप्त है... यहाँ मैला या शुद्ध ऐसा कोई भेद नहीं श्री गजानन महाराज जी ने भोजन किया यह हम ने दूसरी लीला में देखा... अब श्री महाराज जी का भोजन ख़त्म होने के बाद...उनको पीने के लिए पानी चाहिए...यह विचार बंकटलाल...
श्री बंकटलाल अग्रवाल जी बोले हमारा शेगांव धन्य है... ब्रम्हांड नायक योगिराज शेगांव में आये। ..!! हमने प्रथम लीला में देखा ब्रम्हांड नायक श्री गजाजन महाराज कूड़े में फेंके हुवे फेके हुंए थाली से चावल के शीत उठाकर खा रहे थे ! अभी यह जो दृश्य है वह आने जाने वाले लोग...
जिथे स्वामी पाय तिथे न्युन काय - ज्या घरात स्वामी सेवा केली जाते तिथे कश्याची कमतरता नसते. या ठिकाणी घरात म्हणजेच आपले ह्रदय मंदिर. ज्या वेळेस आपण स्वामींची सेवा करतो त्या वेळेस हळू हळू आपले मनाला स्थिरता प्राप्त होते. मनाची शुद्धता झाली कि हृदयातून स्वामी नाम येऊ...
इनका नाम श्री गणेश दत्तात्रेय सहस्रबुद्धे उनको हम सब श्री दास गणू महाराज जी के नाम से जाने जाते है | उनका जनम शके १७८९, पौष शुद्ध एकादशी (दि.०६ /०१/१८६८) को हुवा था | उनका घर का आर्थिक स्तर बहोत अच्छा था | उनकी शिक्षा ४ तक हुवी थी | वे सदैव आनंदी एवं हसत मुख रहते थे |...
खरं तर तारक मंत्र म्हणजे प्रत्येक स्वामीं भक्ता साठी स्वामीं च कवच आहे..प्रत्येक शब्द हा स्वामीं अनुभूती आहे..खरंतर ज्यांनी हा तारक मंत्र शब्द रुपात गुंफला..त्यांची भक्ती ची अवस्था ही खूपच वरच्या पात्रते ची असणार..आणि त्यामुळेच स्वामींनी आपल्या सर्वांसाठी तारक मंत्र...
परब्रम्ह श्री गजानन महाराज कुछ न बोलके भी हमे बता रहे है " अन्न ही परब्रम्ह है" श्री गजानन महाराज लीला - शेगांव में एक देवीदास पातुरकर नाम के गृहस्थ रहते थे ! वह मठाधिपति थे ! एक दिन उनके लड़के की ऋतु शांति का विधी घर मे थी उस वजह से उन्होंने अनेक लोगोंको को भोजन करने...