श्री बंकटलाल अग्रवाल जी बोले हमारा शेगांव धन्य है… ब्रम्हांड नायक योगिराज शेगांव में आये। ..!!
हमने प्रथम लीला में देखा ब्रम्हांड नायक श्री गजाजन महाराज कूड़े में फेंके हुवे फेके हुंए थाली से चावल के शीत उठाकर खा रहे थे ! अभी यह जो दृश्य है वह आने जाने वाले लोग देखरहे थे… लेकिन उधर जाकर उनसे किसीने बात नहीं की ! उसी वक्त उधर श्री बंकटलाल अग्रवाल अपने स्नेही श्री दामोदरपंत कुलकर्णी के साथ उधर आये… श्री बंकटलाल अग्रवाल जी ने देखा की महाराज कूड़े में फेंके हुवे फेके हुंए थाली से चावल के शीत उठाकर खा रहे है.. उन्होंने श्री दामोदरपंत कुलकर्णी जी को कहाँ की यह दिखने में तो यह एक सामान्य व्यक्ति दीखते है… लेकिन ये कोई सामन्य वयक्ति नहीं हो सकते क्यूंकि अगर ये सामान्य व्यक्ति होती तो अन्न माँग कर खाते और श्री पातुरकर भी उन्हें अन्न दे देते ! ये जरूर कोई बड़े संत है ! इसके बाद विनय पूर्वक श्री बंकटलाल अग्रवाल इन्होने श्री महाराज से पूछा… महाराज आप ये क्या कर रहे है… आपको भूख लगी है तो हम आपके लिए भोजन लेकर आये क्या ? श्री महाराज ने उनकी तरफ देखा…उनका तेजः पुंजः मुद्रा देखकर उनके भी मुख से कुछ शब्द नहीं निकले और वो तुरंत श्री पातुरकर जी के पास गए और उनको सभी बात बताकर उनसे भोजन की थाली लेकर आये ! उस थाली में विभिन्न प्रकार के पदार्थ थे… सभी ने श्री महाराज को भोजन ग्रहण करने की विनती की… श्री महाराज ने सभी पदार्थ एकत्रित किये और भोजन किया ! यह सब देखकर सभी लोग …आश्चर्यचकित हो गए और श्री बंकटलाल अग्रवाल बोले हमारा शेगांव धन्य है… ब्रम्हांड नायक योगिराज शेगांव में आये। ..!!
बोध – उपरोक्त लीला से हमें असंख्य बोध प्राप्त हो रहे है.. ब्रम्हांड नायक की हर लील हमारे लिए बोध ही होती है… लेकिन वह समझ ने के लिए श्री बंकटलाल अग्रवाल जैसे भक्ति चाहिए! देखो ना उपरोक्त लीला में उस रस्ते से… उधर से असंख्य लोग गए रहेंगे…लेकिन सभी ने यही सोचा की कोई आम इंसान होगा…भूख लगी होंगी इसलिए खाने को कुछ मिलेगा इसलिए कूड़े में फेंके हुवे फेके हुंए थाली से चावल के शीत उठाकर खा रहा होगा ! लेकिन उसी रस्ते से श्री बंकटलाल अग्रवाल जा रहे थे स्नेही के साथ उनकी चेतना की अवस्था इतनी उच्च थी की उनकी लीला देखकर ही पहचान गए की ये कोई सामन्य वयक्ति नहीं हो सकते ! कितनी उनकी चेतना की अवस्था उच्चतम थी ! श्री महाराज ने सभी पदार्थ एकत्रित करके भोजन करके श्री बंकटलाल अग्रवाल के मन में जो विचार आ रहे थे उसका कुछ न बोल के उसे उत्तर दे दिया ! सचमे क्या भक्ति होंगी श्री बंकटलाल अग्रवाल जी की उन्होंने श्री महाराज की लीला से पहचान लिए की ये कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकते ! हमें श्री महाराज ये भी बोध दे रहे है की… अनेक बार हम खाना खाते वक्त अनेक पदार्थ पसंद नहीं इसलिए नहीं खाते! लेकिन श्री महाराज यहाँ हमें बता रहे की कोनसे भी पदार्थ का स्वाद सिर्फ जीभ के लिए होता अन्न तो हमारे शरीरः की जरूरत है ! उसका मुख्य काम है हमारे उदर की तृष्णा को शांत करना और हमें चुस्ती स्फूर्ति देना न की स्वाद लेना ! इसलिए सभी अन्न पदार्थ का सेवन हमें भगवान् का प्रसाद समझ कर ग्रहण करना चाहिए और यह बात हमें अपने बच्चों को भी सिखानी है… बोलो श्री गजानना महाराज की जय !
प्रार्थना – श्री गजानन महाराज…आपकी लीला समझने में हम असमर्थ है… हमारी चेतना का स्तर तो बहोत कम है… लेकिन आपकी कृपा होंगी तो ये जरूर बढ़ेगा …हम आपसे प्रार्थना करते है की जैसी कृपा श्री बंकटलाल अग्रवाल जी के ऊपर की…उस पात्रता के योग्य हमें बनावो…धन्यवाद माँ यह प्रार्थना करवा के लेने के लिए धन्यवाद !