अगर हमें कोई कुछ बता रहा हो.. हमें वो पसंद नहीं आ रहा हो.. क्यूंकि हम उसका अर्थ अपने विचारों से लगाते है. स्वामी वाणी

स्वामी भक्तो ..बहोत बार हम कुछ पढ़ते है या सुनते है लेकिन बहोत बार बार हम उसका अर्थ हमारी समझ की तहत लगाते है.. उससे बहोत बार हमें निराशा आती है या हमारे मन में शंका निर्माण होती है.. यह नियम केवल अध्यात्म में ही नहीं तो हमारे जीवन में लागु होता है.. इसे हम स्वामी वाणी से समझ ते है.. श्री रामकृष्ण देसाई नाम के स्वामी भक्त थे उन्हें संतान नहीं थी.. स्वामी महाराज ने उन्हें आशीर्वाद दिया तुम्हें संतान होगी आप दोनों मुंबई जाकर बोरी की वृक्ष की सेवा करो.. अब उन दोनों को लगा की बोरी की वृक्ष की पूजा तो नहीं की जाती जरूर स्वामी महाराज ने जल्दी जल्दी में पिपल के वृक्ष के जगह बोरी कहाँ होगा यह सोचकर वो दोनों पीपल के वृक्ष की सेवा करने लगे.. पर उन्हें कोई अनुभूति नहीं आयी.. वो एक दिन मुंबई के मठ में दर्शन करने गए थे तब उन्होंने स्वामी वाणी के बारे में बताया तो वो संन्यासी ने कहाँ स्वामी महाराज ने बोरी का वृक्ष कहाँ यानी स्वामी सूत की करने को बोला है.. उनको अपनी गलती का एहसास हुवा..उन्होंने स्वामी सूत की सेवा शुरू की उन्हें स्वामी वाणी की अनुभूति आयी उन्हें संतान की प्राप्ति हुवी..बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय..देखो ईश्वर के लीला से हमें संकेत लेकर अपने जीवन में उसे लागु करना है.. नहीं तो ईश्वर की लीला..सिर्फ सुनने और पढ़ने तक सीमीत रह जायेंगी..देखो यह लीला पढ़कर सुनकर हमारे मन अनेक बाते आ रही होगी..लेकिन सोचो कभी कभी कोई हमें अच्छी बात बताता है लेकिन हम उसका गलत अर्थ निकालते है और हमारे मन में उस व्यक्ति के प्रति क्रोध उत्पन्न करते है.. बहोत बार उसके कहने का अर्थ अलग होता है हम गलत अर्थ लेते है.. इसलिए हमें तुरंत कोई भी गलत धारणा धारण करनी नहीं है.. इस पर और चिंतन मनन करो.. !

संदर्भ -स्वामी वाणी

 

हमें संकट में ईश्वर को दोष न देते हुवे ईश्वर का प्रसाद समझकर उस पर कार्य करना है.. स्वामी वाणी

हमारे जीवन में कोई समस्या आती है तो हमें लगता है की ईश्वर की हमपर अवकृपा है क्या इसलिए मेरे जीवन में समस्या आ रही है.. लेकिन ईश्वर किसी के ऊपर अवकृपा कभी नहीं करता..लेकिन हमारा मन ऐसा है की कभी कुछ अच्छा होता है तो हम क्या कहते है जरा सोचो..हम कहते है मैंने किया इसलिए यह यश हमें प्राप्त हुवा है.. फिर अपयश आने के बाद ऐसे हम क्यूँ कहते है की ईश्वर की अवकृपा है.. चलो हम स्वामी वाणी की कथा द्वारा इसे समझते है.. एक दिन स्वामी महाराज गुस्से में थे उस वक्त वहाँ माटे करके गृहस्थ आते है और कहते है की इनको इतना गुस्सा आता है.. ये ऐसे कैसे साधु.. उस वक्त स्वामी महाराज कुछ कहते नहीं.. कुछ दिनों के बाद उनका कीर्तन उस गांव में होता है.. उस स्वामी महाराज भी उधर थे.. तब स्वामी महाराज उन्हें कहते है की अगर हमें गुस्सा आता तोइन सबकी हम सब्जी नहीं बनाते..उस वक्त उनको अपनी गलती का एहसास हुवा.. देखो लीला दिखने बहोत साधारण लगती है लेकिन जब हम इसके ऊपर चिंतन करते है.. तब हमें पता चलता है की.. ईश्वर कभी हम पर गुस्सा नहीं होता.. वह तो चाहता है की हमारी प्रगति हो.. संकट दे कर वो हमार आत्म बल बढ़ाता है.. अब यहाँ हमारे मन में प्रश्न निर्माण होगा संकट अवकृपा नहीं क्या ? देखो जिस तरह सुख आये तो हम कहते है क्या ईश्वर ने दिया.. उसी तरह हमारे जीवन आने वाला संकट भी हमारे कर्मो का फल ही होता है.. उलटा ईश्वर चाहता है की समस्या से हमारी उन्नती का मार्ग पता चले.. इसलिए हमें संकट में ईश्वर को दोष न देते हुवे ईश्वर का प्रसाद समझकर उस पर कार्य करना है.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय.

संदर्भ – स्वामी वाणी

स्थानों का महत्व

हमें पवित्र स्थानों को जाना चाहिए वहाँ हमे सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ती होती है..इसके बारे में शिव महा पुराण में कथा आती है..एक दिन नारद मुनि साधना करने के लिए हिमालय के एक गुफा में बैठे थे..अब इनकी साधना में बाधा निर्माण करने हेतु काम देव को विनती की..काम देव ने उनकी साधना रोकने के लिए बहोत प्रयास किये लेकिन।सभी प्रयास विफल हो गए..इसका कारण यह था कि वहाँ भगवान शिवजी नी साधना की थी..उनकी साधना भी भंग करने का प्रयास हुवा था तब उन्होंने काम देव को भस्म कर दिया था..लेकिन वह तो भोले नाथ है..उन्होंने उन्हें माफ् कर दिया और कहाँ की इस जगह जो भी कोई साधना करेंगे उनको आप तकलीफ नहीं दे सकते…इसी कारण श्री नारद मुनि जी की साधना में बाधा नहीं आयी..ऐसा स्थान का महात्म्य है..इस लिये हमें…ऐसे स्थानों में जाकर जप ध्यान करना चाहिये..बोलो उमा महेश्वर देवता की जय

बोध- उपरोक्त लीला से हमें बहोत गहरी समझ प्राप्त होती है..कोई।भी स्थान जो उसका हमें महत्व समझ में आता है..इसलिए हमें ऐसे स्थानों पर जाना चाहिये जहाँ हमें सकारात्क ऊर्जा प्राप्त हो उसी तरह हमें भी हमारे घर में.. हम जहाँ भी हो वहाँ सकारात्मक विचार करना है…जिससे वह स्थान सकारात्मक बने…उसे हमें और वहाँ जो भी लोग हो उन्हें सकारात्मक ऊर्जा मिले…! इसके ऊपर आप भी और चिंतन मनन करे

हमारा जीवन कब तक है हमे मालूम नहीं हमें सिर्फ हर एक कर्म ईश्वर सेवा समझ कर रहना है.

हमारा संपूर्ण जीवन नियोजित है.. कब हमारा जन्म होगा कब मृत्यु यह हमारे हाथ में नहीं…. फिर भी हमें ऐसा लगता है की मैं कर्ता हु.. लेकिन उस वक्त हम यह नहीं सोचते की कब ये साँस बंद हो पता नहीं फिर भी हम यह सब भूल जाते है.. हमें यह भूलना नहीं है.. चलो हम स्वामी वाणी की कथा द्वारे इसे समझते है.. चोलप्पा के पुत्र कृष्णप्पा थे.. एक दिन अचानक कृषणपा की साँस बंद हो गयी सभी तरफ शोक मय वातावरण हो गया.. उसी वक्त उधर स्वामी महाराज आये और उन्होंने कहाँ.. नीलकंठा उठो अभी तक तुम्हारी शादी बाकि है.. उसी वक्त कृष्णप्पा की साँस शुरू हो गयी.. सभी लोग आश्चर्य हो गए.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय.. देखो उपरोक्त लीला हमें क्या सिखाती है.. हमारे मन बहोत से विचार आये रहे गे.. लेकिन हमें ईश्वर हर लीला का चिंतन मनन करके उसके ऊपर कार्य करना होता है.. लेकिन हमारा मन उस लीला में शंका निर्माण करता है.. हमें इस लीला से यही सीखना है की हमारा जीवन कब तक है हमे मालूम नहीं हमें सिर्फ हर एक कर्म ईश्वर सेवा समझ कर रहना है.
संदर्भ स्वामी वाणी

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ईश्वर के दरबार में तो कोई जाती नहीं , धर्म नहीं या पंथ भी नहीं है

स्वामी भक्तो ईश्वर के दरबार में तो कोई जाती नहीं , धर्म नहीं या पंथ भी नहीं है.. लेकिन जब हम हमसे खुद से पूछे तो हम हमको सिर्फ एकहि धर्म के मानते है.. हमें हमारे धर्म का अभिमान जरूर होना चाहिए.. लेकिन और किसी धर्म पर घृणा नहीं होनी चाहिए.. क्यूंकि हम सब को निर्माण करने वाली एक हि शक्ति है.. उसकी हमें अनुभूति करनी है.. उसके लिए हमें खुद के ऊपर कार्य करना होगा.. अगर धर्म की बीच में ही अटक गए तो.. जो चीज ईश्वर हमें देना चाहता है वह दूर रहती है.. इसके लिए हम स्वामी वाणी में जो स्वामी महाराज की लीला आयी है उसे देखते है.. अक्कलकोट गांव में भगवान् खंडोबा का मंदिर में स्वामी महाराज बैठे थे.. वहाँ से एक व्यत्कि जा रहा था.. उसने सोचा यह पागल है.. उसकी मजाक करते है.. उसने स्वामी महाराज को खाली चिलिम दी.. स्वामी महाराज ने वह चीलम ली और उसे पीने लगे.. उससे धुँवा आने लगा.. यह देख कर वह समज गया की यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं यह तो स्वयं ईश्वर ही है.. यह तीन दिन से भूखे है.. उसने स्वामी महाराज को बसप्पा के घर खाना खाने के लिए लेकर गए.. बसप्पा ने भी उन्हें खाना खाने की विनती की तब स्वामी महाराज ने उस व्यक्ति को बोले की तुम भी मेरे साथ खाना खावो.. तब वह बोला की अमुक अमुक धर्म का हु.. तब स्वामी महाराज बोले जब तक तुम हमारे थाली को हाथ नहीं लगाते तब तक हम खाना नहीं खाएंगे.. उसके बाद रिसालदार ने स्वामी महाराज के थाली को स्पर्श किया.. तब स्वामी महाराज ने खाना खाया.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय .. स्वामी भक्तो देखो उपरोक्त लीला हमें सिखाती है की हमारी सोच बदलो.. हम सब एक ही ईश्वर के बनाये हुवे है.. और उसी की प्राप्ति हमारा धर्म है.. जब यह धर्म के अनुसार हम कार्य करेंगे तो जरूर हमें हमारा धर्म तो समझ में आएगा उसी के साथ सभी धर्मो का सार भी समझ आएगा.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय

संदर्भ- स्वामी वाणी

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