स्वामी भक्तो ईश्वर के दरबार में तो कोई जाती नहीं , धर्म नहीं या पंथ भी नहीं है.. लेकिन जब हम हमसे खुद से पूछे तो हम हमको सिर्फ एकहि धर्म के मानते है.. हमें हमारे धर्म का अभिमान जरूर होना चाहिए.. लेकिन और किसी धर्म पर घृणा नहीं होनी चाहिए.. क्यूंकि हम सब को निर्माण करने वाली एक हि शक्ति है.. उसकी हमें अनुभूति करनी है.. उसके लिए हमें खुद के ऊपर कार्य करना होगा.. अगर धर्म की बीच में ही अटक गए तो.. जो चीज ईश्वर हमें देना चाहता है वह दूर रहती है.. इसके लिए हम स्वामी वाणी में जो स्वामी महाराज की लीला आयी है उसे देखते है.. अक्कलकोट गांव में भगवान् खंडोबा का मंदिर में स्वामी महाराज बैठे थे.. वहाँ से एक व्यत्कि जा रहा था.. उसने सोचा यह पागल है.. उसकी मजाक करते है.. उसने स्वामी महाराज को खाली चिलिम दी.. स्वामी महाराज ने वह चीलम ली और उसे पीने लगे.. उससे धुँवा आने लगा.. यह देख कर वह समज गया की यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं यह तो स्वयं ईश्वर ही है.. यह तीन दिन से भूखे है.. उसने स्वामी महाराज को बसप्पा के घर खाना खाने के लिए लेकर गए.. बसप्पा ने भी उन्हें खाना खाने की विनती की तब स्वामी महाराज ने उस व्यक्ति को बोले की तुम भी मेरे साथ खाना खावो.. तब वह बोला की अमुक अमुक धर्म का हु.. तब स्वामी महाराज बोले जब तक तुम हमारे थाली को हाथ नहीं लगाते तब तक हम खाना नहीं खाएंगे.. उसके बाद रिसालदार ने स्वामी महाराज के थाली को स्पर्श किया.. तब स्वामी महाराज ने खाना खाया.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय .. स्वामी भक्तो देखो उपरोक्त लीला हमें सिखाती है की हमारी सोच बदलो.. हम सब एक ही ईश्वर के बनाये हुवे है.. और उसी की प्राप्ति हमारा धर्म है.. जब यह धर्म के अनुसार हम कार्य करेंगे तो जरूर हमें हमारा धर्म तो समझ में आएगा उसी के साथ सभी धर्मो का सार भी समझ आएगा.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय
संदर्भ- स्वामी वाणी
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