परब्रम्ह श्री गजानन महाराज कुछ न बोलके भी हमे बता रहे है ” अन्न ही परब्रम्ह है”
श्री गजानन महाराज लीला
– शेगांव में एक देवीदास पातुरकर नाम के गृहस्थ रहते थे ! वह मठाधिपति थे ! एक दिन उनके लड़के की ऋतु शांति का विधी घर मे थी उस वजह से उन्होंने अनेक लोगोंको को भोजन करने के लिए आमंत्रण दिया था ! बहोत लोग भोजन करने के लिए आये थे ! उस वक्त भोजन करने के लिये पत्तो की थाली का उपयोग होता था ! आज भी गाँव में कुछ जगह पर इसका इस्तेमाल किया जाता है! उनके ऊपर भोजन करने के बाद वह थाली कूड़े में डाल रहे थे! सर्वप्रथम वही पर ही अचानक से श्री गजानन महाराज उस कूड़े के पास आकर बैठ गए ! आजानुबाहु , तेजस्वी मुद्रा ,दिगम्बर , अंगो पर पुराने कपड़े की बंडी और हात में चिलिम थी ! वह परब्रम्ह उस फेके हुंए थाली से चावल के शीत उठाकर खा रहे थे ! बोलो अनंतकोटी ब्रम्हांड नायक श्री गजानन महाराज की जय !
बोध – परब्रम्ह की हर एक लीला हमारे लिए बोध पर होती है ! उनकी लीला से बोध लेने के लिए उनकी कृपा चाहिये ! चलो हम परब्रह्म को प्रार्थना करते है हमें दिल से चिंतन मनन करके लो ! अन्न का हर एक कण महत्वपूर्ण ऐसा है! एक एक कण से अनेकों का उदर भरण हो सकता है ! अन्न पूर्णब्रम्ह है यह समझ हमे हमेशा रखनी है !अन्न का एक भी कण जूथा मत छोड़ो ! वह चाहते तो उधर जाकर भी भोजन कर सकते थे लेकिन उन्होंनो हमें उनकी लीला से समझ दी कि उतना ही अन्न लो जितनी आपको जरूरत हो ! हम जो भी अन्न खा रहे है उस हर एक कण को धन्यवाद दो….. जिस खेती से यह अनाज आया है , जिसने यह धान्य परोसा है उन सबको धन्यवाद दो ! इस और चीज का हमें खयाल हमें याद रखना है की जब भी हम बाहर खाना खाने जाते है तब तो इस बात का सबसे जादा ख़याल रखना है की कुछ भी अन्न बर्बाद न हो ! हमारा यह अन्न के प्रति का भाव श्री गजानना महाराज के बोध पर चलने का एक कदम है ! धन्यवाद …..धन्यवाद … धन्यवाद
प्रार्थना – महाराज हम सबको आज आप ने अन्न पूर्ण ब्रम्ह है इसकी जो समझ दी उसके लिए कोटि कोटि धन्यवाद … यह समझ हमको हमेशा रहे … हमसे अन्न का एक भी कण का नुकसान न हो…अन्न के हर एक कण प्रति हमें आपके बोध की समझ रहे ! धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद