गजाजन महाराज बोल रहे है – यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रम्ह व्याप्त है… यहाँ मैला या शुद्ध ऐसा कोई भेद नहीं
श्री गजानन महाराज जी ने भोजन किया यह हम ने दूसरी लीला में देखा… अब श्री महाराज जी का भोजन ख़त्म होने के बाद…उनको पीने के लिए पानी चाहिए…यह विचार बंकटलाल और दामोदर इनके मन में आया… श्री महाराज जी के पास पानी पीने का बर्तन था लेकिन उसमे…पानी नहीं था… तब दामोदर जी ने उन्हें विनय पूर्वक पूछा…महाराज आपको पीने के लिए पानी लावू क्या ? श्री महाराज ने उनके तरफ देखा और हँसे… और बोले आपको जरूरत होंगी तो जरूर पानी लावो…जगदव्यवहार के अनुसार खाना खाने के बाद पानी पीना तो चाहिए… श्री महाराज के आज्ञा अनुसार दामोदर जी पानी लाने घर में गए… उधर एक गाय… भैस और प्राणियों को पानी पीने के लिए उधर व्यवस्था की गई थी श्री महाराज उधर गए और वह पानी उन्होंने ग्रहण किया… यह सब देखकर सभी लोग अचंबित हो गए … दामोदर पानी लेकर आ गया… तब तक तो श्री महाराज ने पानी पी लिया था… यह सब देखकर दामोदर श्री महाराज को बोलते है श्री महाराज वह पानी मैला है… वह प्राणियोंके लिए पानी है… में आपके लिए मटके का ठंडा और शुद्ध पानी लेकर आया हु… तब श्री महाराज बोलते है यह सब व्यावहारिक बाते हमें मत बतावो…यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रम्ह व्याप्त है… यहाँ मैला या शुद्ध ऐसा कोई भेद नहीं होता… पानी तो पानी ही होता है… पानी और पीने वाला और अलग नहीं है… श्री महाराज जी की यह वाणी सुनकर बंकटलाल और दामोदर दोनों श्री महाराज जी के चरण छूने के लिया आगे आये लकिन उसी वक्त श्री महाराज वायु वेग से उधर से निकल गए| बोलो श्री गजानना महाराज की जय !
उपरोक्त लील का बोध तो बहोत ही गहरा है.. देखो श्री महाराज खाना खाने के बाद पानी के बारे में दामोदर ने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की जगद व्यवहार के अनुसार खाना खाने के बाद पानी तो पीना ही चाहिए.. देखो इसमें तो बहोत गहरी समझ श्री महाराज हमें दे रहे है.. वो तो ब्रम्हांड नायक थे फिर भी उन्होंने हमें समझ देने के लिए जगद व्यवहार के अनुसार पानी ग्रहण किया.. हमें भी अपना संसार करते वक्त..सभी चीजों की पूर्ति हमें करनी है ऐसा नहीं की सिर्फ आध्यात्मिक ता करनी है या सिर्फ संसार करना है… ऐसा नहीं करना है तो हमें सभी चीजों में एकरूपता लानी है…जैसे पानी अगर दूध में मिलता है तो उसका रूप धारण कर लेता है… फिर वह जिस चीज में मिलाया जाता है उसका रूप धारण करता है उसी तरह हमें संसार में रहना है… लेकिन वह काम की पूर्ति होने के बाद उस चीज में अटकना नहीं है हमें सदैव हमें हमारे मन पानी जैसे निर्मल बनाना है… यहाँ महाराज हमें पानी का महत्व भी समझा रहे है… लेकिन यह बहोत बड़ा विषय हो जायेगा… इसपर हमें आगे भी मनन चितन करते है… चलो हम श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थन करते है.. श्री महाराज आज के लीला को निमित्त बनाकर आपने हमें आज जो बोध दिया उसके लिए धन्यवाद… पानी जैसा हमारा मन भी निर्मल हो जाए… इस मन पर हमेशा आपके नाम का जादू रहे जिससे शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हमे हमेशा होगी…हमारे मन का मैल दूर हो जिससे आप जो हमें ज्ञान हमें देना चाहते हो उसके लिए हम पात्र बने… धन्यवाद महाराज .. कोटि कोट धन्यवाद