हमने लीला क्रमांक ८ मी देखा श्री गजाजन महाराज बंकटलाल के घर पर हि रहे… दुसरे दिन श्री महाराज कि विविध सुंगधी द्रव्य… से उनो मंगल स्नान किया गया… उनकी षोडष उपचार सहित पूजा कि गई… नैवैद्य भी दिखाया… सचमे इतना भक्ती मय वातावरण था कि सभी लॉग सबकुछ भूलकर श्री सेवा में तल्लीन हो गए थे… बंकटलाल के ख़ुशी तो मन में नहीं समां रही थी… उसका घर तो द्वारकापुरी बन गया था… वो दिन सोमवार का दिन था… उस वक्त उधर श्री बंकटलाल के चचेरे भाई इच्छाराम भी वहाँ थे…वो शिवजी के भक्त थे… उनका उस दिन उपवास था.. उन्होंने श्री महाराज को शाम के समय प्रार्थना की… श्री महाराज आप तो करुणाघन है… आप सभी क इच्छा की पूर्ति करते हो..आपसे मेरी विनती है… आप ने दोपहर को भोजन किया ..अभी शाम को भी भोजन कीजिए ना… आप जब तक भोजन नहीं करेंगे तब तक में भी कुछ नहीं खावुंगा…आप सभी की इच्छा की पूर्ति करते हो… मेरी भी इतना इच्छा पूर्ण करो… श्री महाराज तो करुणा घन है… वो भोजन करने को राजी हो गए… इच्छाराम भोजन की थाली लेकर आ गए…थाली में… आंबेमोहर चावल …मोतीचूर के लड्डू…जिलेबी….और भी भोत से पदार्थ थे… भोजन की थाली देखकर श्री महाराज खुद से ही बोले …” अब स तरह से खावो की कभी मिला न हो… सबको दिखादो अघोरी खाने की आदत” ऐसा बोलै कर श्री महाराज खाना खाने बैठे…उन्होंने थाली में का सभी अन्न खत्म कर दिया…इतना अन्न खाया की… उनको जोर से उल्टी हो गयी… यह उनकी लीला थी बोलो श्री गजानन महाराज की जय
बोध – उपरोक्त लीला तो बहोत ही गहरी ऐसी है… उपरोक्त लीला में इच्छा रामजी ने अपनी इच्छा युक्त भक्ति के लिए श्री महाराज को भोजन का आग्रह किया।। उनको मालुम था की श्री महाराज का भोजन हुवा है फिर भी अपनी व्रत के पुर्ति के लिए श्री महाराज को भोजन का आग्रह किया… श्री महाराज ने भी हम सभी को बोध मिले इस लिए भोजन करने के लिए तैयार हो गए… वे सिर्फ भोजन के लिए तैयार ही नहीं हुवे तो उन्होंने जो भी कुछ उनके भोजन के लिए लाया था वो सभी खत्म कर दिया और ख़त्म होने के तुरंत बाद उनको उल्टी हुवी… यहाँ वो यह सब पचा सकते थे… लेकिन उन्होंने वहाँ जान बूझकर उल्टी की… उनको सभी को दिखाना था की… किस भी चीज का आग्रह मत करो… जिसको जितनी भूख होंगी उतना वह खायेगा… आप उसे जोर जबरदस्ती से मत खिलावो… यहाँ इच्छा रामजी की तरह हमारा भी होता है…कोई भी खाने की अच्छी चीज दिखने के बाद.. हमें खाने का मोह हो जाता है… और फिर हमें भूख नहीं होती फिर भी हम अतिरक्त अन्न का सेवन करते है… और एक प्रकार से हमारे शरीर पर अत्याचार करते है..यहाँ गजानन महाराज वो अन्न पचा सकते थे लेकिन…हमें बोध देने के लिए उन्होंने यह लीला की बोलो श्री गजानन महाराज की जय !
प्रार्थना – श्री गजानन महाराज आप तो करुणाघन …आजकी इच्छा रामजी की लीला के माध्यम से हमें जो आपने हमारी गलत इच्छा वो पर किस तरह हमें काम करने की जरूरत है यह समझ हमें दी.. हमारे अंदर का इच्छाराम है उसका नियंत्रण आपके पास लो… जिससे हमें सही गलत की समझ प्राप्त हो जाएगी …धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद।