श्री बंकटलाल इन्होंने अपने पिताजी श्री भवानी रामजी से श्री गजानन महाराज जी के बारे सबकुछ बताया और उनसे श्री महाराज को अपने घर पर ले आने की अनुमती माँगी ..श्री भवानी रामजी ने उनको अनुमति दी… अब श्री बंकटलाल जी उन्हें ढूंढने लगे… चार दिन के बाद संध्या समय को उनको श्री गजानन महाराज जी का दर्शन हुवा…उन्होंने देखा की गौ माता के बीच में श्री महाराज बैठे है… श्री बंकटलाल श्री महाराज के पास आये और उन्होंने उनको विनम्रता पूर्वक प्रणाम किया और श्रद्धा पूर्वक उन्होंने श्री महाराज को विनती की श्री महाराज आप हमारे घर चलिए..बहोत कृपा होगी…श्री महाराज उनके घर जाने के लिए राजी हो गए… बंकटलाल सूर्यास्त के वक्त श्री महाराज को अपने घर लेकर आये… श्री महाराज की तेजपुंजः मूर्ति देखकर श्री भवानी रामजी उनके चरणों में नतमस्तक हो गए.. उन्होंने उनकी स्तुति मय प्रार्थना की… है प्रभो आप साक्षात सांब सदाशिव है… प्रदोष समय आप आये है.. मै आपसे प्रार्थना करता हु.. आप हमारे घर पर भोजन ग्रहण कीजिए ..उन्होंने बिल्व पत्र अर्पण कर उनकी पूजा की .. श्री भवानी राम ने श्री महाराज को प्रार्थना तो की वो श्री महाराज ने स्वीकार भी कर ली पर यही भोजन तैयार नहीं था… भोजन बनने में समय लगने वाला था उनके मन में आया की… भोजन तैयार होने तक श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… उन्होंने सोचा क दोपहर का बनाया हुवा भोजन है… उसे हम ख़राब तो नहीं मान सकते … श्री महाराज भी इसका स्वीकार करेंगे… यह सोचेकर उन्होंने भोजन की थाली तैयार की …उसमे पूरी ..भाजी .. विविध फल… बादाम ..ऐसे वभिन्न पदार्थ उन्होंने श्री महाराज को भोजन के लिए लाए ..उनकी उन्होंने सर्वप्रथम श्री महाराज की पंचोपचार पूजा की और बाद में श्री महाराज को भोजन करने के लिए श्री महाराज से प्रार्थना की… श्री महाराज ने भी बड़े प्रेम से वह भोजन स्वीकार किया …जो जो पदार्थ सभी श्री महाराज ने खा लिए…. उस दिन श्री महाराज उन्हींके घर पर रहे…. बोलो श्री गजानना महाराज की जय
बोध –
ईश्वर हर एक लीला प्रेरणादाई होती है… जिससे के ऊपर अगर हम चिंतन मनन करेंगे तो… वह हमें हर एक समय मार्गदर्शन ही देती है… उपरोक्त लीला में श्री बंकटलाल जी की इच्छा तो बहोत थी की श्री महाराज को घर ले आने की… लेकिन उन्होंने सर्वप्रथम अपने पिताजी से अनुमति मांगी …यानी यहाँ हमें पितृ भक्ति की प्रेरणा यहाँ मिलती है… भगवान् कृपा के लिए सर्वप्रथम हमारे घर में जो… मातृ- पितृ देव है उनकी सेवा करनी चाहिए तभी ईश्वर की भी कृपा होती है… श्री भवानीराम जी की भक्ति भी कितनी उच्चतम थी इसका हमें दर्शन होता है… देखो भवानीराम जी की श्रद्धा और भक्ति कैसी थी… जब श्री महाराज उनके घर आये वो समय सूर्यास्त का समय था… उस वक्त भोजन तैयार नहीं था… लेकिन श्री महाराज भोजन के लिए तैयार हुवे है…और अब ताजा भोजन बनाने के वक्त लगेगा ..और इतने समय श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… यह बात उनके मन में आयी इसलिए उन्होंने सोचै की दोपहर को जो भोजन बचा है वही श्री महाराज को भोजन के लिए दिया…इधर उनके मन श्री महाराज के प्रति श्रद्धा थी और मन विचार था की श्री महाराज हमारे घर से भूखे न जाये…कितनी उच्चतम श्रद्धा और भक्ति थी… श्री महाराज ने भी वह भोजन प्रेम से ग्रहण किया…यहाँ हमें बोध मिलता है की कोई भी हमारे घर से भूखा न जाए… उसी तरह हमारे भाव में अगर सच्चा पैन रहेगा तो ईश्वर हमारा हर एक प्रसाद ग्रहण करते ही है.. धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद
चलो हम श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है- है महाराज आज आपने आजकी लीला के माध्यम से जो भी मातृ पितृ भक्ति की हमें समझ दी उसके लिए धन्यवाद …हमको भी ऐसी भक्ति दो… हमसे भी अन्नदान हो इस पात्र हमें बनावो…जैसी कृपा भवानीराम पर हुवी वैसी हम पर भी करो… यह प्रार्थना करवा लेने के लिया धन्यवाद…कोटि धन्यवाद।
श्री गजानन महाराज की जय!