संकष्टी चतुर्थी – गणेश भक्तोंका एक व्रत है जिसे संकष्टी चतुर्थी कहाँ जाता है ! अनेक भक्त यह व्रत करते है ! इस व्रत के पीछे बहोत सी कथाये है ! अभी हम गणेश पुराण में जो कथा है वो यहाँ देखते है ! कृतवीर्य नाम के राजा थे वे एक परिपूर्ण ऐसे राजा थे ! उनकी पत्नी का नाम सुगंधा था वो भी पति सेवा में मग्न रहती थी ! वे दोनों का संसार खूब अच्छा चल रहा था ! लेकिन उनके जीवन में एक ही बात की न्यूनता थी ! उनको संतान नहीं थी ! उन्होने बहोत से वैद्य को दिखाया , बहोतसे व्रत किये लेकिन उनको संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा था ! आगे जाकर उन्हें संसार में रुची नहीं रही इसलिए वे दोनों सभी सुखोंका त्याग करके वन में चले गए ! वहाँ जाने के बाद उन्होंने सभी सुखोंका त्याग किया था इसलिए जो भी कुछ मिलेगा उसके ऊपर वे अपना उदर निर्वाह करने लगे , इस वजह से वे दोनों की सेहत कमजोर होने लगी ! वे दोनों की स्थिति देखकर श्री नारदमुनि जी को बहोत दुःख हुआ ! नारद मुनि तुरंत स्वर्गलोक गए और उन्होंने कृतवीर्य के पिताजी को उनके बेटे के बारे में बताया तो उन्हें भी बहोत दुःख हुआ ! उन्होंने ब्रम्हदेव जी को प्रार्थना की – हे ब्रम्हदेव जी आपको प्रणाम – कृतवीर्य मेरा पुत्र है ! उसे संतति सुख नहीं मिल रहा ! अभी आप ही कृपा करके इसके लिए कुछ मार्ग दिखा दी जे ! ब्रम्हदेव जी ने उन्हें बताया पिछले जन्म में तुम्हारा पुत्र एक चोर था ! वह लोगोंको लूटकर उन्हें मारकर अपने कुटुंब की उदरनिर्वाह चलता था ! एक दिन उसने कुछ ब्राम्हणोकि हत्या की.. वो दिन माघ कृष्ण चतुर्थी का था ! उस दिन उसने पुरे दिन कुछ भी नहीं खाया था… उसे रात को घर आते आते बहोत देर हो गयी थी ! चंद्रोदय के बाद उसने खाना खाया ! इस प्रकार जाने अनजाने में उससे यह व्रत हुआ ! इस पुण्य के प्रभाव से उसे इस जन्म में राज्य पद प्राप्त हुआ… लेकिन ब्रम्हहत्या होने के कारन उसे संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ… अगर वो संकष्टी चतुर्थी का व्रत करेगा… तो उसे अवश्य संतान सूख प्राप्त होगा ! पिता के आज्ञा के अनुसार , संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया उसे संतान सुख प्राप्त हुवा ! इस तरह संकष्टी चतुर्थी व्रत के पीछे का रहस्य है ! ऊपर के कथा से हमें संकष्टी चतुर्थी के बारे में पता चला इसके ऊपर हमें चिंतन मनन करके हमें बोध हो रहा है की हम जो भी कुछ कर्म करते है उस कर्म का फल हमें जरूर मिलता है फिर वो राजा हो या रंक हो ! इसलिए हमें अपना कर्म अच्छा ही करना है ! सच्ची संकष्टी चतुर्थी का उपवास वही होगा अगर हमारा हर एक कर्म अच्छा कर्म हो, फिर हमारा हर एक दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत बन जायेगा और गणेश जी की कृपा प्राप्त हो जाएगी ! आपको हमारा यह ब्लॉग कैसा लगा हमें जरूर बताइये ! धन्यवाद श्री गणेश जी … कोटि कोटि धन्यवाद !
देव फक्त देव्हाऱ्यात नाही, तर आपल्या अंतःकरणात आहे.- देवघर
देव फक्त देव्हाऱ्यात नाही, तर आपल्या अंतःकरणात आहे.देवघर असं बनवा की तिथे बसल्यावर मन प्रसन्न होईल आणि घरात सकारात्मकता निर्माण होईल. देवघर म्हणजे आपल्या घराचं आध्यात्मिक हृदय.कुठे असावं? देव कोणते असावेत? देवघर - आपल्या सर्वांच्या जिव्हाळ्याचा प्रश्न देवघर कुठे असावे...