भगवान् श्री गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम क्यूँ की जाती है ?
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
कार्य कोनसा भी हो उस कार्य का आरंभ भगवान् श्री गणेश जी की पूजा से किया जाता है ! यह प्रथा बरसो से चल रही है और चलती रहेगी जब हम कोनसा भी कार्य करते है… अगर उस कार्य के बारे में हमें अगर सम्पूर्ण जानकारी होगी तो वह कार्य अधिकधिक् आसान होता है और हमें आनंद भी प्राप्तः होता है ! अनेक बार हम हमारे घर में पंडित जी को बुलाते है और वह कहते की गणेश जी की पूजा से हम कार्य की शुरुवात करते है ! आज तक आपने कभी यह सोचा है क्या ? गणेश जी की ही पूजा सर्वप्रथम क्यूँ की जाती है ? सिर्फ पहले पूजा करते इसलिए हमें गणपति जी की पूजा करनी है क्या ? अगर यह सवाल आपके मन में आया हो लेकिन आपको इसका जबाब नहीं मिला हो ! आज हम इसी के बारे में यहाँ जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करने वाले है ! वैसे तो इसके बारेमे बहोतसी कथाये है लेकिन हम यहाँ एक कथा के द्वारे यह समज़ने का प्रयास करते है ! एक दिन सभी देवो की चर्चा शुरू थी उस चर्चा का विषय था की सबसे पहले पूजनीय कौन है ? सबसे पहले किसकी पूजा करनी चाहिए ? अभी यह चर्चा तो सभी देवो के बीच में शुरू थी ! हम अक्सर देखत है की हमें लगता है की में ही सर्व श्रेष्ठ हु… सबने मुझसे सलाह मसलत करनी चाहिए , मेरी ही बात सुननी चाहिए , मेरी ही वाह वाह करनी चाहिए ! लगता है की नहीं आप अपने आप से पूछो ! उसी तरह सभी देवो की बीच में इस विषय पर चर्चा शुरू थी ! हर एक को लग रहा था में ही सर्वश्रेष्ठ हु मेरी ही पूजा सर्व प्रथम हो ! इस पर उनकी बहोत चर्चा हुई लेकिन उसमे किसका भी एक मत नहीं हो रहा था ! तब सभी देवो ने अपना प्रश्न वंदनीय श्री नारद जी से पूछा तब उन्होने सोच कर बोले की हम इस प्रश्न को लेकर भगवान श्री शंकर जी और पार्वती माता जी के पास जाते है ! वे सभी कैलास पे जाते है और उनका प्रश्न भगवान् जी से पूछते है ! की सब पहले किसकी पूजा सर्व प्रथम होनी चाहिए तब भोलेनाथ जी बोले की यह बहोत कठिन सवाल है ! इसका जबाब देने के लिए हमें एक परीक्षा लेनी पड़ेगी उस में जो प्रथम आएगा उसकी पूजा हर एक कार्य से पहले की जाएगी ! सभी देव इस परीक्षा के लिया तैयार हो गए ! उस वक्त उधर भगवान् श्री गणेश जी भी थे ! भोलेनाथ जी बोले की आप सभी को ब्रह्मांड की परिक्रमा करनी है जो भी कोई यह परिक्रमा पूर्ण करके सर्व प्रथम आएगा वही सर्व प्रथम पूजा के लिए पात्र हो गा ! सभी देव इस परिक्रमा के लिए तैयार हो गए ! सभी देव परिक्रमा को शुरवात करते है लेकिन श्री गणेश जी उधर खड़े रहते है तब श्री नारद मुनि जी उनसे पूछते है की आप नहीं जाएंगे क्या ? आप इस परिक्रमा में भाग नहीं ले रहे क्या ! भगवान् श्री गणेश जी ने कुछ भी नहीं कहाँ और माता पार्वतीजी और भोलेनाथ जी को नमस्कार किया किया और उन्ही दोनों को सात परिक्रमा की और उनके सामने हाँथ जोड़कर खड़े हो गए ! सभी देव एक एक करके अपनी परिक्रमा पूर्ण करके आ रहे थे ! सबसे पहले कार्तिकेय जी आ गए सभी को लगा की अब कार्तिकेय जी को ही प्रथम पूजा का सन्मान प्राप्त होगा ! सभी लोगो को लगा अब शिवजी कार्तिकेय जी का नाम लेंगे लेकिन भगवान् शिवजी ने कहा की श्री गणेश जी को सर्वप्रथम पूजा का सन्मान मिलेगा यह शिवजी के वचन सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ की ये कैसे हुआ तब भगवान श्री गणेश जी बोले सभी ब्रम्हांड तो यही है उनकी परिक्रमा की इसका मतलब सभी विश्व की परिक्रमा पूर्ण हो गयी ! यह सब सुनकर सभी को गणेश जी की बात पे सभी ने एक घोष में कहाँ की सच में भगवान् गणेश जी प्रथम वंदनीय है ! इस तरह सभी कार्यसे पहले गणपति जी की पूजा प्रथम करना शुरू हुआ !
उपरोक्त कथा में हम सभी को प्रथम गणपति पूजन क्यूँ होता है इसका जबाब आपको मिला होगा ! इसके बारे में बहोत सी कथाये है ! लेकिन हमें यहाँ इस कथा के में जो भाव है उसके उपर हमें चिन्तन करना है ! श्री गणेश जी ने अपनी माता पिताजी को परिक्रमा की उस वक्त सभी देव विश्व परिक्रमा करने में लगे थे श्री गणेश जी कही भी नहीं जाकर अपनी माता पिताजी की परिक्रमा की इस में हमें बहोत गहरा संदेश प्राप्त होता है ! हम सूख प्राप्ति के लिए अनेक उपाय करते है लेकिन घर में जो हमारे माता पिताजी है , सांस – ससुरजी है उनकी सेवा नहीं करते ! सच में उपरोक्त कथा के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है की अगर हमें आगे बढ़ना है तो हमें पहले हमारे माता पिताजी की सेवा करनी चाहिए ! आप ने अपना अमूल्य समय निकालकर पढ़ने के लिए धन्यवाद !