श्री महाराज इन्होंने भोजन किया पीताम्बर ने लाया हुवा पानी पिया उसके बाद श्री महाराज बंकट लाल को बोलते है..तुम्हारे जेब में जो सुपारी है वो दो हमको ..श्री महाराज ने ऐसे बोलते ही श्री बंकट लाल ने जेब से सुपारी निकालकर श्री महाराज को दी उसी जेब में..दो पैसे थे वो भी।उसने श्री महाराज को देने लगे…महाराज ने उसके तरफ देखा और हँसकर बोले..हमको।क्या व्यापारी समझते हो क्या? तुम्हारी व्यवहारिक बाते तुम्हारे पास ही रखो..हमे तो..भक्ति चाहिए.. वो तुम्हारे पास थी इसलिए तुम्हे दर्शन हुवा..जावो अब कीर्तन सुनो..यह सब सुनकर उसकी श्रद्धा और बढ़ गई…बोलो श्री गजानन महाराज की जय
बोध..उपरोक्त लीला दिखने में तो बहोत छोटी है लेकिन बहोत प्रेरणादायक है…श्री महाराज ने बंकटलाल को सुपारी मांगी..सुपारी बहोत कड़क होती है उसे खाने योग्य बनाने के लिये तोड़ना पड़ता है…तब हम उसे खा सकते है..हमारा मन भी उस सुपारी के जैसा है… जिसपर हतोड़ा मारना पड़ता है..तब हमारे मन में विश्वास ..श्रद्धा भक्ति बढ़ती है… सुपारी को निमित्त बना कर श्री महाराज ने श्री बंकट लाल की मन की चावी उनके पास ले ली है..उसके बाद बंकटलाल ने सुपारी के साथ पैसे भी श्री महाराज को देने का प्रयास किया तो श्री महाराज उन्हें बोले…यह व्यवहारिक चीजे नहीं चाहिए..हमें तो भक्ति चाहिए..यहाँ श्री महाराज हमें बहोत गहरी समझ दे रहे है..भगवान को हम कोई भौतिक वस्तु अर्पण करके भगवान की कृपा प्राप्त नही होती..कृपा प्राप्ती के लिए..हमारा अंतकरण का भाव शुद्ध होना चाहिए..जिससे हमारे मन में शुद्ध भक्ति के भाव प्रगट हो जाएंगी..और हमे बंकट लाल की तरह श्री महाराज का दर्शन और भक्ति प्राप्त होंगी..! चलो हम श्री महाराज से प्रार्थना करते है…,ब्रम्हांडनायका..हमारे तन..मन कि सफाई करो…शरीर की हर एक कोशिका को शुद्ध करो…हमारे मन में भी अनन्य भक्ति के भाव ,श्रद्धा और विश्वास को बढ़ावो..हमें आपकी सेवा के योग्य बनावो..है श्री गजानन मा ऊली यह प्रार्थना करवा लेने की लिए धन्यवाद… अंनत कोटि धन्यवाद.. बोलो श्री गजानन महाराज की जय!