गजानन महाराज चरित्र दर्शन ३

Sep 26, 2021 | संत गजानन महाराज, हिंदी

Share

गजाजन महाराज बोल रहे है – यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रम्ह व्याप्त है… यहाँ मैला या शुद्ध ऐसा कोई भेद नहीं

 

श्री गजानन महाराज जी ने भोजन किया यह हम ने दूसरी लीला में देखा… अब श्री महाराज जी का भोजन ख़त्म होने के बाद…उनको पीने के लिए  पानी चाहिए…यह विचार बंकटलाल और दामोदर इनके मन में आया… श्री महाराज जी के पास पानी पीने का बर्तन था लेकिन उसमे…पानी नहीं था… तब दामोदर जी ने उन्हें विनय पूर्वक पूछा…महाराज आपको पीने के लिए पानी लावू क्या ? श्री महाराज ने उनके तरफ देखा और हँसे… और बोले आपको जरूरत होंगी तो जरूर पानी लावो…जगदव्यवहार के अनुसार खाना खाने के बाद पानी पीना तो चाहिए… श्री महाराज के आज्ञा अनुसार दामोदर जी पानी लाने घर में गए… उधर एक गाय… भैस और प्राणियों को पानी पीने के लिए  उधर व्यवस्था की गई थी श्री महाराज उधर गए और वह पानी उन्होंने ग्रहण किया… यह सब देखकर सभी लोग अचंबित हो गए  … दामोदर पानी लेकर आ गया… तब तक तो श्री महाराज ने पानी पी लिया था… यह सब देखकर दामोदर श्री महाराज को बोलते है श्री महाराज वह पानी मैला है… वह प्राणियोंके लिए  पानी है… में आपके लिए मटके का ठंडा और शुद्ध पानी लेकर आया हु… तब श्री महाराज बोलते है यह सब व्यावहारिक बाते  हमें मत बतावो…यह सम्पूर्ण सृष्टि ब्रम्ह व्याप्त है… यहाँ मैला या शुद्ध ऐसा कोई भेद नहीं होता… पानी तो पानी ही होता है… पानी और पीने वाला और अलग नहीं है… श्री महाराज जी की यह वाणी सुनकर बंकटलाल और दामोदर दोनों श्री महाराज जी के चरण छूने के लिया आगे आये लकिन उसी वक्त श्री महाराज वायु वेग से उधर से निकल गए| बोलो श्री गजानना महाराज की जय !

उपरोक्त लील का बोध तो बहोत ही गहरा है.. देखो श्री महाराज खाना खाने के बाद पानी के बारे में दामोदर ने उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की जगद व्यवहार के अनुसार खाना खाने के बाद पानी तो पीना ही चाहिए.. देखो इसमें तो बहोत गहरी  समझ श्री महाराज हमें दे रहे है.. वो तो ब्रम्हांड नायक थे फिर भी उन्होंने हमें समझ देने के लिए  जगद व्यवहार के अनुसार पानी ग्रहण किया.. हमें भी अपना संसार करते वक्त..सभी चीजों की पूर्ति हमें करनी है ऐसा नहीं की सिर्फ आध्यात्मिक ता करनी है या सिर्फ संसार करना है… ऐसा नहीं करना है तो हमें सभी चीजों में एकरूपता लानी है…जैसे पानी अगर दूध में मिलता है तो उसका रूप धारण कर लेता है… फिर वह जिस चीज में मिलाया जाता है उसका रूप धारण करता है उसी तरह हमें संसार में रहना है… लेकिन वह काम की पूर्ति होने के बाद उस चीज में अटकना नहीं है हमें सदैव हमें हमारे मन पानी जैसे निर्मल बनाना है… यहाँ महाराज  हमें पानी का महत्व भी समझा रहे है… लेकिन यह बहोत बड़ा विषय हो जायेगा… इसपर हमें आगे भी मनन चितन करते है… चलो हम श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थन  करते है.. श्री महाराज आज के लीला को निमित्त बनाकर आपने हमें आज जो बोध दिया उसके लिए धन्यवाद… पानी जैसा हमारा मन भी निर्मल हो जाए… इस मन पर हमेशा आपके नाम का जादू रहे जिससे शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हमे हमेशा होगी…हमारे मन का मैल  दूर हो जिससे आप जो हमें ज्ञान हमें देना चाहते हो उसके लिए  हम पात्र बने… धन्यवाद महाराज .. कोटि कोट धन्यवाद


Share
और पढिये !!

चोवीस तास स्वामीं भक्तीत कसे रहावे..!

स्वामी भक्तहो.. आपण अनेकदा म्हणतो ऐकतो.. अनेकदा स्वामी वाणीतून आपण ऐकतो "स्वामी भक्तीत रहावे" स्वामी भक्तीत राहणे याचा अर्थ असा आहे का आपण २४ तास स्वामी नाम घ्यायचे आहे.. हे शक्य सुद्धा नाही.. तर मग आपण स्वामी भक्तीत राहणार कसे.. स्वामी भक्तीत राहणे शक्य आहे का ? हो...

स्व अनुभव नसणारी गोष्ट इतरांना सांगू नये – संदर्भ – श्री गजानन विजय अध्याय ८

स्व अनुभव नसणारी गोष्ट इतरांना सांगू नये - संदर्भ - श्री गजानन विजय अध्याय ८ श्री गजानन महाराज श्री खंडू पाटील यांचे बंधू कृष्णाजी पाटील यांच्या घरी राहत होते.. श्री भास्कर पाटील आणि तुकाराम कोकाटे श्रीं ची सेवा करत होते.. अचानक एकेदिवशी त्या मळ्यात काही गोसावी आले...

अगर हमें कोई कुछ बता रहा हो.. हमें वो पसंद नहीं आ रहा हो.. क्यूंकि हम उसका अर्थ अपने विचारों से लगाते है. स्वामी वाणी

स्वामी भक्तो ..बहोत बार हम कुछ पढ़ते है या सुनते है लेकिन बहोत बार बार हम उसका अर्थ हमारी समझ की तहत लगाते है.. उससे बहोत बार हमें निराशा आती है या हमारे मन में शंका निर्माण होती है.. यह नियम केवल अध्यात्म में ही नहीं तो हमारे जीवन में लागु होता है.. इसे हम स्वामी वाणी...

हमें संकट में ईश्वर को दोष न देते हुवे ईश्वर का प्रसाद समझकर उस पर कार्य करना है.. स्वामी वाणी

हमारे जीवन में कोई समस्या आती है तो हमें लगता है की ईश्वर की हमपर अवकृपा है क्या इसलिए मेरे जीवन में समस्या आ रही है.. लेकिन ईश्वर किसी के ऊपर अवकृपा कभी नहीं करता..लेकिन हमारा मन ऐसा है की कभी कुछ अच्छा होता है तो हम क्या कहते है जरा सोचो..हम कहते है मैंने किया इसलिए...

स्थानों का महत्व

हमें पवित्र स्थानों को जाना चाहिए वहाँ हमे सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ती होती है..इसके बारे में शिव महा पुराण में कथा आती है..एक दिन नारद मुनि साधना करने के लिए हिमालय के एक गुफा में बैठे थे..अब इनकी साधना में बाधा निर्माण करने हेतु काम देव को विनती की..काम देव ने उनकी...

हमारा जीवन कब तक है हमे मालूम नहीं हमें सिर्फ हर एक कर्म ईश्वर सेवा समझ कर रहना है.

हमारा संपूर्ण जीवन नियोजित है.. कब हमारा जन्म होगा कब मृत्यु यह हमारे हाथ में नहीं.... फिर भी हमें ऐसा लगता है की मैं कर्ता हु.. लेकिन उस वक्त हम यह नहीं सोचते की कब ये साँस बंद हो पता नहीं फिर भी हम यह सब भूल जाते है.. हमें यह भूलना नहीं है.. चलो हम स्वामी वाणी की...

ईश्वर के दरबार में तो कोई जाती नहीं , धर्म नहीं या पंथ भी नहीं है

स्वामी भक्तो ईश्वर के दरबार में तो कोई जाती नहीं , धर्म नहीं या पंथ भी नहीं है.. लेकिन जब हम हमसे खुद से पूछे तो हम हमको सिर्फ एकहि धर्म के मानते है.. हमें हमारे धर्म का अभिमान जरूर होना चाहिए.. लेकिन और किसी धर्म पर घृणा नहीं होनी चाहिए.. क्यूंकि हम सब को निर्माण...