इनका नाम श्री गणेश दत्तात्रेय सहस्रबुद्धे उनको हम सब श्री दास गणू महाराज जी के नाम से जाने जाते है | उनका जनम शके १७८९, पौष शुद्ध एकादशी (दि.०६ /०१/१८६८) को हुवा था | उनका घर का आर्थिक स्तर बहोत अच्छा था | उनकी शिक्षा ४ तक हुवी थी | वे सदैव आनंदी एवं हसत मुख रहते थे | कुछ दिन उन्होंने बड़ोदा के संस्थान में क्लर्क की नौकरी की लेकिन कुछ दिन के बाद उन्हें उसमे रुची नहीं आयी इसलिए उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी | उनकी पत्नी का नाम सरस्वति था | कुछ दिन के बाद वे पुलिस में सिपाई पद पर भर्ती हो गए | उनका पुलिस में काम करना घर वालों को पसंद नहीं था | दासगणू महाराज की उच्च कवित्व रचना की प्रतिभा उन्हें उपजत थी | मामलेदार शेटफळकरांच्या जी ने उन्हे कहाँ की तुम्हे इतनी अच्छी कवित्व शक्ति प्राप्त हुवी इसका इस्तेमाल तुम संतो के चरित्र काव्य रुप करने में क्यूँ नहीं करते | उनकी बात उन्होंने मानी और “श्रीसंत दामाजी की कहानी” उन्होंने खुद रचना की और उसका सादरीकरण किया | आगे कुछ दिनों के बाद उनको उनके आध्यात्मिक गुरु मिले उनका नाम श्रीवामनशास्त्री इस्लामपूरकर | श्रीवामनशास्त्री इस्लामपूरकर जी आज्ञा के अनुसार उनके बाद उनको शिरडी के साई बाबा का मार्गदर्शन प्राप्त हुवा! उन्होंने विविध संतो के चरित्र लिखे ! २४ वर्षे तक उनको साईं बाबा जी की सेवा करने का भाग्य उन्हें प्राप्त हुवा | श्रीसाई संस्थानचे श्रीदासगणु महाराज संस्थापक अध्यक्ष थे | उनकी भक्ति इतनी उच्तम थी की उन्होंने इतने सारे ग्रंथो की रचना की लेकिन वे हमेशा प्रसिद्धि से दूर थे | ऐसे ये महान संत दि.२६/११/१९६२ शके १८८३, कार्तिक वद्य त्रयोदशी को अनंत में विलीन हो गए | लेकिन आज भी अनेक ग्रंथो में माध्यम से वे हमें मार्गदर्शन कर रहे है | ऐसे महान संत विभूति को हम प्रार्थना करते है की ..श्री दासगुण जी महाराज अपने इतने संत चरित्रों की निर्मिति की यह हमारे ऊपर कृपाहै ..हमें इस पात्र बणावो की आप ने जो भी चरित्रों का निर्माण किया है उसका चिंतन मनन करने की पात्रता हमें दो… हमारी भक्ति बढ़ावो | हम आपके विचारों के दास बने | हमारी दास्य भक्ति बढ़ावो | आपके चरणों में कोटि कोटि धन्यवाद !
परमशांती मधील स्वरनाद – श्री स्वामी समर्थ
स्वामी वाणी पुष्प ५८०(पर्व ४ थे भाग ८४)* *आजचे चिंतन-मनन* परमशांती मधील स्वरनाद तू , शून्या मधील अस्तित्व तू , बुद्धीच्या ही पलीकडे असलेला , ऐसा अतर्क्य समर्थ तू !! www.SwamiVaanni.co.in स्वामीं भक्तहो...परमशांती मधील स्वरनाद तू !!! आपण अनेकदा कळत न कळत कधी तरी म्हणतो...