श्री गजानन महाराज दर्शन लीला 7

श्री बंकटलाल इन्होंने  अपने पिताजी श्री भवानी रामजी से श्री गजानन महाराज जी के बारे सबकुछ बताया और उनसे श्री महाराज को अपने घर पर ले आने की अनुमती  माँगी ..श्री भवानी रामजी ने उनको अनुमति दी… अब  श्री बंकटलाल जी उन्हें ढूंढने लगे… चार दिन के  बाद संध्या समय को उनको श्री गजानन महाराज जी का दर्शन हुवा…उन्होंने देखा की  गौ माता के बीच में श्री महाराज बैठे है… श्री बंकटलाल श्री महाराज के पास आये और उन्होंने उनको विनम्रता पूर्वक प्रणाम किया और श्रद्धा पूर्वक उन्होंने श्री महाराज को विनती की श्री महाराज आप हमारे घर चलिए..बहोत  कृपा होगी…श्री महाराज उनके घर जाने के लिए  राजी हो गए… बंकटलाल सूर्यास्त के वक्त श्री महाराज को अपने घर लेकर आये… श्री महाराज की तेजपुंजः मूर्ति देखकर श्री भवानी रामजी उनके चरणों में नतमस्तक हो गए.. उन्होंने उनकी स्तुति मय  प्रार्थना की… है प्रभो आप साक्षात सांब  सदाशिव है… प्रदोष समय आप आये है.. मै आपसे प्रार्थना करता हु.. आप हमारे घर पर भोजन ग्रहण कीजिए ..उन्होंने बिल्व पत्र  अर्पण कर उनकी पूजा की .. श्री भवानी राम ने श्री महाराज   को प्रार्थना तो की वो श्री महाराज ने स्वीकार भी कर ली पर यही भोजन तैयार नहीं था… भोजन बनने में समय लगने वाला था उनके मन में आया की… भोजन तैयार होने तक श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… उन्होंने सोचा क दोपहर का बनाया हुवा भोजन है… उसे हम ख़राब तो नहीं मान सकते … श्री महाराज भी इसका स्वीकार करेंगे… यह सोचेकर उन्होंने भोजन की थाली तैयार की …उसमे पूरी ..भाजी .. विविध फल… बादाम ..ऐसे वभिन्न पदार्थ उन्होंने श्री महाराज को भोजन  के लिए  लाए ..उनकी उन्होंने सर्वप्रथम श्री महाराज की पंचोपचार पूजा की और बाद में श्री महाराज को भोजन  करने के लिए श्री महाराज से प्रार्थना की… श्री महाराज ने भी बड़े प्रेम से वह भोजन स्वीकार किया …जो जो पदार्थ सभी श्री महाराज ने  खा लिए…. उस दिन श्री महाराज उन्हींके घर पर रहे…. बोलो श्री गजानना महाराज की जय

बोध –

ईश्वर हर एक लीला प्रेरणादाई होती है… जिससे के ऊपर अगर हम चिंतन मनन करेंगे तो… वह हमें हर एक समय मार्गदर्शन ही देती है… उपरोक्त लीला में श्री बंकटलाल जी की इच्छा तो बहोत थी की श्री महाराज को घर ले आने की… लेकिन उन्होंने सर्वप्रथम अपने पिताजी से अनुमति मांगी …यानी यहाँ हमें पितृ भक्ति की प्रेरणा यहाँ मिलती है… भगवान् कृपा के लिए  सर्वप्रथम हमारे घर में जो… मातृ- पितृ देव है उनकी सेवा करनी चाहिए तभी ईश्वर की भी कृपा होती है… श्री भवानीराम जी की भक्ति भी कितनी उच्चतम थी इसका हमें   दर्शन होता है… देखो भवानीराम जी की श्रद्धा और भक्ति कैसी  थी… जब श्री महाराज उनके घर आये वो समय सूर्यास्त का समय था… उस वक्त भोजन तैयार नहीं था… लेकिन श्री महाराज भोजन के लिए तैयार हुवे है…और अब ताजा  भोजन बनाने के वक्त लगेगा ..और इतने समय श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… यह बात उनके मन में आयी इसलिए उन्होंने सोचै की दोपहर को जो भोजन बचा है वही श्री महाराज को भोजन के लिए दिया…इधर उनके मन श्री महाराज के प्रति श्रद्धा थी और मन विचार था की श्री महाराज हमारे घर से भूखे न जाये…कितनी उच्चतम श्रद्धा और भक्ति थी… श्री महाराज ने भी वह भोजन प्रेम से ग्रहण किया…यहाँ हमें बोध मिलता है की कोई भी हमारे घर से भूखा न जाए… उसी तरह हमारे भाव में अगर सच्चा पैन रहेगा तो ईश्वर हमारा हर एक प्रसाद ग्रहण करते ही है..  धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद

चलो हम श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है- है महाराज आज आपने आजकी लीला के माध्यम से जो भी मातृ पितृ भक्ति की हमें समझ दी उसके लिए  धन्यवाद …हमको भी ऐसी भक्ति दो… हमसे भी अन्नदान हो इस पात्र हमें बनावो…जैसी कृपा  भवानीराम पर हुवी वैसी  हम पर भी करो… यह प्रार्थना करवा लेने के लिया धन्यवाद…कोटि धन्यवाद।

श्री गजानन महाराज की जय!

 

श्री गजानन महाराज दर्शन लीला 6

सभी लोग अब श्री गोविंद बुवा जी का कीर्तन सुनने के लिए  आये थे… श्री गजानन महाराज भी नीम  के पेड़ के पास बैठकर कीर्तन सुन रहे थे… श्री गोविन्द बुवा जी ने कीर्तन के लिए श्रीमद भागवत के एकादश स्कंध  का हंस गीता का श्लोक कीर्तन सेवा के लिए  लिया था… बुवा ने कीर्तन की पूर्वार्ध बताया … कीर्तन का उत्तरार्ध  करते वक्त उनको दिक्कत आने लगे तब… श्री महाराज ने सभी को कीर्तन का उत्तरार्ध बताया…उनका कीर्तन सुनकर सभी लोग तृप्त हो गए… तब श्री गोविंद  बुवा ने उधर उपस्थित लोगो को बोले…श्री महाराज को इधर आने की विनती करो… तब बंकटलाल और कुछ लोग श्री महाराज के पास जाकर उनको उधर आने के लिए  प्रार्थना करते है… लेकिन श्री महाराज नहीं आते… तब गोविंद  बुवा खुद श्री महाराज के पास आते है और उनको मंदिर आने के लिए विनंती करते है… आप स्वयंम  शिव स्वरुप है… कृपया आप शिव मंदिर में चलिए…आपके बिना मंदिर सुना  सुना है… मेरी पूर्व जन्म की कुछ तो पुण्य कर्म के कारण मुझे आपका दर्शन हुवा और आपके वाणी से कीर्तन का उत्तरार्ध सुनने को मिला…तब श्री महाराज ने उनकी तरफ देखा और बोले अरे लोगों  को बताते हो ” ईश्वर सर्वत्र है… अंदर बाहर ऐसा कुछ बह नहीं है… और खुद उस कीर्तन कथा के विरुद्ध बर्ताव कर रहे हो… लोगों  को एक बात बताते हो और खुद उसके अनुसार आचरण नहीं करते …औरों  जैस व्यवहारिक कीर्तन कार मत बनो… जावो कीर्तन समाप्त करो… मै  इधर बैठकर कीर्तन सुनता हु…गोविंद  बुवा व्यास पीठ पर आये और उन्होंने सभी को बताया की हम सभी नसीबवाले है… हमारे गांव में प्रत्यक्ष परब्रम्ह आये है… उनकी सेवा करो… हम सभी का कल्याण होगा…सभी ने एक साथ श्री गजानन महाराज का जयघोष किया।।। बोलो गजानन महाराज की जय

बोध – उपरोक्त लीला का बोध समझने की पात्रता दो… उपरोक्त लीला में श्री गोविंद  बुवा ने कीर्तन शुरू किया…वो बहोत बड़े कीर्तनकार थे उन्होंने पूर्वार्ध तो बताया लेकिन उत्तरार्ध बताते वक्त उनको क्या बताये यह समझ में नहीं आ रहा था… उसी वक्त श्री गजानन महाराज कीर्तन का उत्तरार्ध पूर्ण किया …ऐसा हमारे जीवन में भी बहोत बार होता है.. हम किसी समस्या में होते है.. और हम ईश्वर से प्रार्थना करते है। .. वस् वक्त हमें कोई आकर मदत कर जाता है…उसे ईश्वर ने ही हमारी साहयता के लिए  भेजा होता है… और हम कहते है.. भगवान् की तरह आकर आपने मेरी मदत की… लेकिन कुछ दिन बाद हम यह बात भूल जाते है… श्री गोविंद  बुवा श्री महाराज से कहते है आप शिव स्वरुप है कृपया मंदिर में चलिए…तब श्री महाराज उन्हें बोलते है आप कीर्तन में लोगों  बताते है की ईश्वर सर्वत्र है और आप ही यह बात भूल जा रहे हो… आप व्यवहारिक मत बनो… यहाँ श्री महाराज हमें बता रहे है मै  सर्वत्र हु… अमुक एक स्थल पर जावोगे तो ही मैं  मिलूंगा ऐसा नहीं है… यहाँ श्री महाराज यह भी बोध दे रहे है की अच्छी बाते सिर्फ लोगों  को बताने के लिए  नहीं होती पहले उसका अनुकरण हमने खुद करना चाहिए…इसके ऊपर जितना हम अधिक चितन मनन करेंगे उतना घर बोध श्री महाराज हमें देंगे

चलो श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है.. प्रार्थना श्री गजानन महाराज आप हमारी हर एक प्रार्थना की पूर्ति करते हो… जब आप हमारी इच्छा की पूर्ति करते हो उस वक्त हमारी श्रद्धा का स्तर  बहोत ऊँचा होता है… लेकिन कुछ दिन के बाद यह फिर  से कम हो जाता है… जिस तरह श्री गोविंद  बुवा जी को समझ  दी… वैसी समझ  हमें दो… हम में आध्यात्मिकता में जो व्यव्यहारिकता है वो दूर करो और हमें सच्ची समझ दो… जिससे है आपकी सच्ची भक्ति मिल जाए… धन्यवाद महाराज…यह प्रार्थना करवा लेने के लिए  धन्यवाद।।। श्री गजानन महाराज की जय !!!

 

गजानन महाराज चरित्र दर्शन 6

श्री महाराज इन्होंने भोजन किया पीताम्बर ने लाया हुवा पानी पिया उसके बाद श्री महाराज बंकट लाल को बोलते है..तुम्हारे जेब में जो सुपारी है वो दो हमको ..श्री महाराज ने ऐसे बोलते ही श्री बंकट लाल ने जेब से सुपारी निकालकर श्री महाराज को दी उसी जेब में..दो पैसे थे वो भी।उसने श्री महाराज को देने लगे…महाराज ने उसके तरफ देखा और हँसकर बोले..हमको।क्या व्यापारी समझते हो क्या? तुम्हारी व्यवहारिक बाते तुम्हारे पास ही रखो..हमे तो..भक्ति चाहिए.. वो तुम्हारे पास थी इसलिए तुम्हे दर्शन हुवा..जावो अब कीर्तन सुनो..यह सब सुनकर उसकी श्रद्धा और बढ़ गई…बोलो श्री गजानन महाराज की जय

बोध..उपरोक्त लीला दिखने में तो बहोत छोटी है लेकिन बहोत प्रेरणादायक है…श्री महाराज ने बंकटलाल को सुपारी मांगी..सुपारी बहोत कड़क होती है उसे खाने योग्य बनाने के लिये तोड़ना पड़ता है…तब हम उसे खा सकते है..हमारा मन भी उस सुपारी के जैसा है… जिसपर हतोड़ा मारना पड़ता है..तब हमारे मन में विश्वास ..श्रद्धा भक्ति बढ़ती है… सुपारी को निमित्त बना कर श्री महाराज ने श्री बंकट लाल की मन की चावी उनके पास ले ली है..उसके बाद बंकटलाल ने सुपारी के साथ पैसे भी श्री महाराज को देने का प्रयास किया तो श्री महाराज उन्हें बोले…यह व्यवहारिक चीजे नहीं चाहिए..हमें तो भक्ति चाहिए..यहाँ श्री महाराज हमें बहोत गहरी समझ दे रहे है..भगवान को हम कोई भौतिक वस्तु अर्पण करके भगवान की कृपा प्राप्त नही होती..कृपा प्राप्ती के लिए..हमारा अंतकरण का भाव शुद्ध होना चाहिए..जिससे हमारे मन में शुद्ध भक्ति के भाव प्रगट हो जाएंगी..और हमे बंकट लाल की तरह श्री महाराज का दर्शन और भक्ति प्राप्त होंगी..! चलो हम श्री महाराज से प्रार्थना करते है…,ब्रम्हांडनायका..हमारे तन..मन कि सफाई करो…शरीर की हर एक कोशिका को शुद्ध करो…हमारे मन में भी अनन्य भक्ति के भाव ,श्रद्धा और विश्वास को बढ़ावो..हमें आपकी सेवा के योग्य बनावो..है श्री गजानन मा ऊली यह प्रार्थना करवा लेने की लिए धन्यवाद… अंनत कोटि धन्यवाद.. बोलो श्री गजानन महाराज की जय!

श्री गजानन महाराज दर्शन लीला ०५

श्री बंकटलाल और पीतांबर  शिंपी  कीर्तन सुनने गए थे… लेकिन उधर ह उनको श्री गजानन महाराज दिखे… फिर क्या वो कीर्तन छोड़कर श्री महाराज के पास आ गए… उन्होंने श्री महाराज जी से पूछा…की आपको खाना लावू क्या? तब श्री महाराज उन्हें बोले आपको जररूत होंगी तो मालिनी के घर से झुनका  भाकर लेकर आवो… पीतांबर झुनका  भाकर  लेकर आया… वह श्री महाराज ने खा ली और  पीतांबर को बोले यह  मटका लेकर जावो उस नदी ( ओढ़ा ) से पानी लेकर आवो तब पीतांबर बोला महाराज वहाँ  पानी बहोत कम है और उस पानी को को गंदी  बदबू आती है… आपकी इजाजत हो तो मै  दूसरी जगह से अच्छा  पानी लाता हु… श्री महाराज बोले उधर से ही पानी लावो और पानी हाथ स मत भरना… मटके से ही पानी भरना… श्री महाराज की आज्ञा अनुसार पीतांबर उधर गए.. उधर जाकर उसने देखा तो हाथ से ही पानी भरने की जरूरत थी लेकिन महाराज की आज्ञा थी उस अनुसार उसने मटका पानी भरने के लिए डुबोया तो चमत्कार हो गया… मटका तो भर ही गया लेकन उधर भरपूर पानी उस नदी में आ गया और वह पानी इतना स्वच्छ था की उसमें हमारा चेहरा भी दिख सकता था… यह सब देखकर वो आश्चर्यचकित हो गया और उसने श्री गजानन महाराज का जय जयकार किया। बोलो श्री गजानन महाराज की जय!

बोध – उपरोक्त लीला से हमें श्री महाराज हमें अनेक बोध देते है… वैसे तो हर का बोध अलग ही होगा क्यूंकि श्री महाराज हर  एक को अलग अलग बोध देते है… यहाँ श्री महाराज से बंकटलाल और पीतंबर  ने पूछा की आपके लिए  खाना लावू क्या…तब श्री महाराज बोले रहे है तुमको जरूरत  लावो…यहाँ महाराज कह रहे है आप जो भी भगवान् की सेवा करते है वो किस लिए  करते है… तो हम हमारे लिए  करते है लेकिन हम  कहते है की मैंने भगवान अमुक सेवा भगवांन के लिए की और यही गलती न हो इसलिए श्री महाराज कह रहे है तुमको जरूरत होंगी तो लावो याने सेवा करो… श्री महाराज ने उन्हें कहाँ  जुनका ( हरी मिर्च की चटनी ) भाकर  लेकर आवो.. देखो यहाँ श्री महाराज हमें बता है… भाकरी के पीठ के जैसे मृदु (पिष्टमय) बनो… और चटनी जैसे कणखर बनो… तो हमारा जीवन आनंददाई बन जाएगा…यहाँ पीताम्बर के कृति से  प्राप्त  है की गुरु आज्ञा का पालन कैसे करना चाहिए…मन कुछ भी शंका न लाते हुवे…और उस श्रद्धा के फल स्वरुप उन्हें स्वच्छ पानी प्राप्त हुवा..इसके ऊपर आप और चिंतन मनन करे!

चलो श्री महाराज से हम प्रार्थना करते है…

प्रार्थना है ब्रम्हांड नायक। आपकी लीला तो हमारे लिए प्रेरणा है.. पर वह समझने के लिए  आपकी कृपा चाहिए…जिस तरह उस नदी पानी बढ़ गया उस तरह हमारे जीवन आपकी भक्ति की बाढ़ आये… जैसा पानी स्वच्छ हो गया उस तरह हमारा मन भी शुद्ध और निर्मल बनावो…धन्यवाद महाराज…यह प्रार्थना करवा के लेने के लिए  धन्यवाद!

बोलो श्री गजानन महाराज की जय

गजानन महाराज चरित्र दर्शन 4

श्री गजानन महाराज जी के दर्शन क प्यास जगी श्री बंकटलाल जी के मन में

 

श्री गजानना चरित्र दर्शन ४ – श्री बंकटलाल जी को पूर्ण विश्वास था की श्री गजानन महाराज जी ब्रम्हांड नायक है… अब उनके मन में श्री दर्शन की प्यास जग गई थी… उनको भूख प्यास मीट  गई थी… उनकी आँखे अब सिर्फ श्री महाराज के दर्शन  की राह  देख रही थी… उनको सब तरफ श्री महाराज ही है ऐसा लगने लगा था… उनके चित्त की यह स्थिति वे किसी को बता बह नहीं सकते थे… उनके हाव भाव देख कर उनके पिताजी ने उसे पूछा बेटा  क्या हुवा कुछ चिंता है क्या? तुम्हारी प्रकृति तो ठीक है ना… उन्होंने पिताजी को सब कुछ ठीक है यह बताया..लेकिन उनकी खोज शुरू ही थी… उनके घर के पास श्री रामाजी पंत  देशमुख नाम एक व्यस्क सद्गृहस्थ रहते थे… वे बुजुर्ग थे… उनको श्री बंकटलाल जी ने श्री महाराज के बारे में बताया तब उन्होंने बंकटलाल की बाते  सुनकर कहाँ  वे जरूर बड़े संत महात्मा होंगे…इस तरह ४ दिन  गए… श्री बंकटलाल के मन में वही शुरू था… उन्हीं  दिन गांव में श्री गोविन्द बुवा टाकलीकर जो बहोत बड़े कीर्तनकार थे उनका कीर्तन था ..उनके कीर्तन के लिए बंकटलाल गया वहा पर उनके दोस्त पीताम्बर भी आया था… वो दोनों की वहाँ  मुलाखत हो गई… तब बंकटलाल ने उन्हें श्री गजानन महाराज के बारे  में बताया..उसी वक्त उन्हें श्री महाराज का दर्शन हो गया फिर क्या उनकी दर्शन की इच्छा पूर्ण हो गयी… बोलो गजानन महाराज की जय !!

उपरोक्त लीला का बोध तो भक्ति की परमोच्च अवस्था का हमारे लिए एक पाठ है… देखो ना श्री बंकटलाल जी का विश्वास इतना गहरा था की एक ही मुलाखत में उन्होंने  श्री महाराज पर श्रद्धा बैठ गई…उनको श्री महाराज के दर्शन की प्यास इतनी गहरी  थी की उनको ४ ही दिन में फिर से श्री महाराज का दर्शन हो गया…यहाँ और एक बात हमें बोध हो रहे है श्री बंकटलाल जी से वो यह की.. पिताजी का आदर करने का.. देखो उनके पिताजी ने उनसे पूछा था  की क्या कुछ समस्या है क्या ? लेकिन बंकटलाला ने उनको तकलीफ न हो…उस तरह आदर पूर्वक उनको बताया की कुछ भी समस्या नहीं है… उसके बाद उन्होंने श्री गोविन्द बुवा  को यह सब बात बताई तो उन्होंने भी उन्हें सकारात्म भाव से कहाँ  के वे जरुर कोई महापुरुष ही होंगे यह बात सुनकर उनकी श्रद्धा बढ़ी…इस सबके बीच में उन्होंने बहोत सी प्रार्थना ये  की होंगी और इसका परिणाम यह हुवा की उनको श्री ब्रम्हांड नायक गजानन दर्शन प्राप्त हुवा बोलो श्री गजानन महाराज की जय!!

प्रार्थना – है ब्रम्हांडनायका।आज आपने हमें आज के लीला के माध्यम से जो श्रद्धा..भक्ति..और विश्वास का पाठ सिखाया उसके लिए धन्यवाद..इतना श्रद्धा..भक्ति..और विश्वास हमारे मन में जगावो जिस से आपके लीलावो का अर्थ हम समझ आपके कृपा पात्री हम बने… यह प्रार्थना करवा के लेने के लिए धन्यवाद… कोटि कोटि धन्यवाद !