अन्न  हे पूर्ण ब्रह्म आहे त्याचा आदर करा!! श्री गजानन वाणी भाग १ – संदर्भ -ग्रंथ श्री गजानन विजय

श्री गजानन महाराज काही ना बोलता कृती द्वारे सांगत आहेत.. अन्न  हे पूर्ण ब्रह्म आहे त्याचा आदर करा!!

श्री क्षेत्र शेगाव मध्ये देवीदास पातुरकर नावाचे गृहस्थ राहात होते… ते मठाधिपती होते… एके दिवशी त्यांच्या घरी त्याच्या मुलाच्या ऋतू शांतीचा कार्यक्रम होता… त्या निमित्त त्यांनी अनेक लोकांना भोजनासाठी निमंत्रण दिले होते…त्या काळी जेवण करण्यासाठी पानाच्या पत्रावळीचा वापर केला जात… आज हि अनेक ठिकाणी याचा वापर होतो… जेवण  झाल्यावर त्या पत्रावळी त्यांच्याह घर शेजारी असणाऱ्या कचरा कुंडीत टाकल्या जात होत्या… सर्वप्रथम त्याच ठिकाणी श्री गजानन महाराज त्या कचरा कुंडीपाशी येऊन बसलेले दिसले… आजानुबाहु , तेजस्वी मुद्रा ,दिगम्बर ,अंगावर जुन्या कापडाची बंडी आणि हातात चिलीम होती… परब्रम्ह श्री गजानन महाराज त्या पत्रावळी वरील जे भाताचे शीत होते ते उचलून खात होते…

!! गण गण गणात बोते !!बोला

|| अनंत कोटी ब्रम्हाण्ड नायक महाराजाधिराज योगीराज परब्रम्ह सच्चितानंद

भक्त प्रतिपालक शेगाँव निवासी समर्थ सदगुरु श्री संत गजानन महाराज की जय ||

बोध – परब्रम्हाची प्रत्येक लीला हि आपल्या साठी प्रेरणा देणारी आहे… आणि त्यांच्या लीलेतुन बोध प्राप्त होण्यासाठी त्यांची कृपाच असावी लागते…  चला आपण त्यांनाच प्रार्थना करूया आम्हाला  हृदयातून मार्गदर्शन करा… अन्नाचा प्रत्येक कण  हा महत्वपूर्ण असा आहे… एक एक कणा पासून अनके कण बनतात आणि त्यातून अनेक जणांचे उदरभरण होऊ शकते… अन्न हे पूर्ण ब्रम्ह आहे हि समज आपणस कायम ठेवायची आहे… आपणस अन्नाचा एकही कण  वाया जाणार नाही या साठी प्रयन्त करायचा आहे… या ठिकाणी श्री गजानन महाराज श्री पातुरकर यांच्या  घरी जाऊन सुद्धा जेवण करू शकत होते… परंतु त्यांना आपल्याला समज देण्यासाठी हि लीला केली आहे… आपल्याला जेवढे आवश्यक आहे तवढेच अन्न  घ्या .. तसेच अन्नाच्या प्रत्येक कणाला  धन्यवाद द्या… त्याचप्रमाणे ज्या शेती मधून हे धान्य आले त्या शेतकऱ्याला धन्यवाद द्या… ज्यांनी हे अन्न  बनवले त्यांना धन्यवाद द्या…तसेच आणखीन ऐका  गोष्टीचे भान आपणस ठेवायचे आहे ते म्हणजे जेव्हा आपण बाहेर हॉटेल मध्ये जेवण करण्यास जातो त्यावेळेस आपणस या गोष्टी चे जास्त भान ठेवायचे आहे… कारण आपण अनेकदा अन्न  तसेच टाकून देतो… इथे आपणस विशेष काळजी घ्यायची आहे… आपला आहे अन्ना विषयी चा भाव…  समज श्री गजानन महाराजांच्या सेवेचे पहिले पाऊल ठरेल… !!बोला

|| अनंत कोटी ब्रम्हाण्ड नायक महाराजाधिराज योगीराज परब्रम्ह सच्चितानंद

भक्त प्रतिपालक शेगाँव निवासी समर्थ सदगुरु श्री संत गजानन महाराज की जय ||

चला आपण सर्व मिळून श्री गजानन महाराजांना प्रार्थना करूया – हे ब्रम्हांडनायक श्री गजानन महाराज आज आपण आम्हाला अन्न हे पूर्णब्रम्ह हि जी समज  दिलीत त्या बद्दल धन्यवाद…हि समज आम्हाला कायम राहावी आणि अन्नाच्या एकाही  कणाचे नुकसान आमच्या द्वारे होऊ नये..अन्नाचा प्रत्येक कण  ग्रहण करताना तुमच्या बोधाची.. लीलेची आठवण असावी हीच प्रार्थना… धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद

 

श्री गजानन चरित्र दर्शन ८

हमने लीला क्रमांक ८ मी देखा श्री गजाजन महाराज बंकटलाल के घर पर हि रहे… दुसरे दिन श्री महाराज कि विविध सुंगधी द्रव्य… से उनो मंगल स्नान किया गया… उनकी षोडष उपचार सहित पूजा कि गई… नैवैद्य भी दिखाया… सचमे इतना भक्ती मय  वातावरण था कि सभी लॉग सबकुछ भूलकर श्री सेवा में तल्लीन हो गए थे… बंकटलाल के ख़ुशी तो मन में नहीं समां रही थी… उसका घर तो द्वारकापुरी बन गया था… वो दिन सोमवार का दिन था… उस  वक्त उधर श्री बंकटलाल के  चचेरे भाई इच्छाराम  भी वहाँ  थे…वो शिवजी के भक्त थे… उनका उस  दिन उपवास था.. उन्होंने श्री महाराज को शाम के समय प्रार्थना की… श्री महाराज आप तो करुणाघन है… आप सभी क इच्छा की  पूर्ति करते हो..आपसे मेरी विनती है… आप ने दोपहर को भोजन किया ..अभी शाम को भी भोजन कीजिए ना… आप जब तक भोजन नहीं करेंगे तब तक में भी कुछ नहीं खावुंगा…आप सभी की इच्छा की पूर्ति करते हो… मेरी भी इतना इच्छा  पूर्ण करो… श्री महाराज तो करुणा घन  है… वो भोजन करने को राजी हो गए… इच्छाराम  भोजन की थाली लेकर आ गए…थाली में… आंबेमोहर चावल …मोतीचूर के लड्डू…जिलेबी….और भी भोत से पदार्थ थे… भोजन की थाली देखकर श्री महाराज खुद से ही बोले …” अब स तरह से खावो की कभी मिला न हो… सबको दिखादो अघोरी खाने की आदत” ऐसा बोलै कर श्री महाराज खाना खाने बैठे…उन्होंने थाली में का सभी अन्न खत्म  कर दिया…इतना अन्न खाया की… उनको जोर से उल्टी हो गयी… यह उनकी लीला थी बोलो श्री गजानन महाराज की जय

बोध – उपरोक्त लीला तो बहोत ही गहरी ऐसी है… उपरोक्त लीला में इच्छा रामजी ने अपनी इच्छा  युक्त भक्ति के लिए  श्री महाराज को भोजन का आग्रह किया।। उनको मालुम था की श्री महाराज का भोजन हुवा है फिर भी अपनी व्रत के पुर्ति के लिए श्री महाराज को भोजन का आग्रह किया… श्री महाराज ने भी हम सभी को बोध मिले इस लिए  भोजन करने के लिए तैयार हो गए… वे सिर्फ भोजन के लिए तैयार ही नहीं हुवे तो उन्होंने जो भी कुछ उनके भोजन  के लिए लाया था वो सभी  खत्म कर दिया और ख़त्म होने के तुरंत बाद उनको  उल्टी हुवी… यहाँ वो यह सब पचा सकते थे…  लेकिन उन्होंने वहाँ  जान बूझकर उल्टी  की… उनको सभी को दिखाना था की… किस भी चीज का आग्रह मत करो… जिसको जितनी भूख होंगी उतना वह खायेगा… आप उसे जोर जबरदस्ती से मत खिलावो… यहाँ इच्छा रामजी की तरह हमारा भी होता है…कोई भी खाने की अच्छी चीज दिखने के बाद.. हमें खाने का मोह हो जाता है… और फिर हमें भूख नहीं होती फिर भी हम अतिरक्त अन्न का सेवन करते है… और एक प्रकार से हमारे शरीर पर अत्याचार करते है..यहाँ गजानन महाराज वो अन्न पचा सकते थे लेकिन…हमें बोध देने के लिए  उन्होंने यह लीला की बोलो श्री गजानन महाराज की जय !

प्रार्थना – श्री गजानन महाराज आप तो करुणाघन …आजकी इच्छा  रामजी की लीला के माध्यम से हमें जो आपने हमारी गलत इच्छा वो पर किस तरह हमें काम करने की जरूरत है यह समझ हमें दी.. हमारे अंदर का इच्छाराम है उसका नियंत्रण आपके पास लो… जिससे हमें सही गलत की समझ प्राप्त हो जाएगी …धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद।

श्री गजानन महाराज दर्शन लीला 7

श्री बंकटलाल इन्होंने  अपने पिताजी श्री भवानी रामजी से श्री गजानन महाराज जी के बारे सबकुछ बताया और उनसे श्री महाराज को अपने घर पर ले आने की अनुमती  माँगी ..श्री भवानी रामजी ने उनको अनुमति दी… अब  श्री बंकटलाल जी उन्हें ढूंढने लगे… चार दिन के  बाद संध्या समय को उनको श्री गजानन महाराज जी का दर्शन हुवा…उन्होंने देखा की  गौ माता के बीच में श्री महाराज बैठे है… श्री बंकटलाल श्री महाराज के पास आये और उन्होंने उनको विनम्रता पूर्वक प्रणाम किया और श्रद्धा पूर्वक उन्होंने श्री महाराज को विनती की श्री महाराज आप हमारे घर चलिए..बहोत  कृपा होगी…श्री महाराज उनके घर जाने के लिए  राजी हो गए… बंकटलाल सूर्यास्त के वक्त श्री महाराज को अपने घर लेकर आये… श्री महाराज की तेजपुंजः मूर्ति देखकर श्री भवानी रामजी उनके चरणों में नतमस्तक हो गए.. उन्होंने उनकी स्तुति मय  प्रार्थना की… है प्रभो आप साक्षात सांब  सदाशिव है… प्रदोष समय आप आये है.. मै आपसे प्रार्थना करता हु.. आप हमारे घर पर भोजन ग्रहण कीजिए ..उन्होंने बिल्व पत्र  अर्पण कर उनकी पूजा की .. श्री भवानी राम ने श्री महाराज   को प्रार्थना तो की वो श्री महाराज ने स्वीकार भी कर ली पर यही भोजन तैयार नहीं था… भोजन बनने में समय लगने वाला था उनके मन में आया की… भोजन तैयार होने तक श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… उन्होंने सोचा क दोपहर का बनाया हुवा भोजन है… उसे हम ख़राब तो नहीं मान सकते … श्री महाराज भी इसका स्वीकार करेंगे… यह सोचेकर उन्होंने भोजन की थाली तैयार की …उसमे पूरी ..भाजी .. विविध फल… बादाम ..ऐसे वभिन्न पदार्थ उन्होंने श्री महाराज को भोजन  के लिए  लाए ..उनकी उन्होंने सर्वप्रथम श्री महाराज की पंचोपचार पूजा की और बाद में श्री महाराज को भोजन  करने के लिए श्री महाराज से प्रार्थना की… श्री महाराज ने भी बड़े प्रेम से वह भोजन स्वीकार किया …जो जो पदार्थ सभी श्री महाराज ने  खा लिए…. उस दिन श्री महाराज उन्हींके घर पर रहे…. बोलो श्री गजानना महाराज की जय

बोध –

ईश्वर हर एक लीला प्रेरणादाई होती है… जिससे के ऊपर अगर हम चिंतन मनन करेंगे तो… वह हमें हर एक समय मार्गदर्शन ही देती है… उपरोक्त लीला में श्री बंकटलाल जी की इच्छा तो बहोत थी की श्री महाराज को घर ले आने की… लेकिन उन्होंने सर्वप्रथम अपने पिताजी से अनुमति मांगी …यानी यहाँ हमें पितृ भक्ति की प्रेरणा यहाँ मिलती है… भगवान् कृपा के लिए  सर्वप्रथम हमारे घर में जो… मातृ- पितृ देव है उनकी सेवा करनी चाहिए तभी ईश्वर की भी कृपा होती है… श्री भवानीराम जी की भक्ति भी कितनी उच्चतम थी इसका हमें   दर्शन होता है… देखो भवानीराम जी की श्रद्धा और भक्ति कैसी  थी… जब श्री महाराज उनके घर आये वो समय सूर्यास्त का समय था… उस वक्त भोजन तैयार नहीं था… लेकिन श्री महाराज भोजन के लिए तैयार हुवे है…और अब ताजा  भोजन बनाने के वक्त लगेगा ..और इतने समय श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… यह बात उनके मन में आयी इसलिए उन्होंने सोचै की दोपहर को जो भोजन बचा है वही श्री महाराज को भोजन के लिए दिया…इधर उनके मन श्री महाराज के प्रति श्रद्धा थी और मन विचार था की श्री महाराज हमारे घर से भूखे न जाये…कितनी उच्चतम श्रद्धा और भक्ति थी… श्री महाराज ने भी वह भोजन प्रेम से ग्रहण किया…यहाँ हमें बोध मिलता है की कोई भी हमारे घर से भूखा न जाए… उसी तरह हमारे भाव में अगर सच्चा पैन रहेगा तो ईश्वर हमारा हर एक प्रसाद ग्रहण करते ही है..  धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद

चलो हम श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है- है महाराज आज आपने आजकी लीला के माध्यम से जो भी मातृ पितृ भक्ति की हमें समझ दी उसके लिए  धन्यवाद …हमको भी ऐसी भक्ति दो… हमसे भी अन्नदान हो इस पात्र हमें बनावो…जैसी कृपा  भवानीराम पर हुवी वैसी  हम पर भी करो… यह प्रार्थना करवा लेने के लिया धन्यवाद…कोटि धन्यवाद।

श्री गजानन महाराज की जय!

 

श्री गजानन महाराज दर्शन लीला 6

सभी लोग अब श्री गोविंद बुवा जी का कीर्तन सुनने के लिए  आये थे… श्री गजानन महाराज भी नीम  के पेड़ के पास बैठकर कीर्तन सुन रहे थे… श्री गोविन्द बुवा जी ने कीर्तन के लिए श्रीमद भागवत के एकादश स्कंध  का हंस गीता का श्लोक कीर्तन सेवा के लिए  लिया था… बुवा ने कीर्तन की पूर्वार्ध बताया … कीर्तन का उत्तरार्ध  करते वक्त उनको दिक्कत आने लगे तब… श्री महाराज ने सभी को कीर्तन का उत्तरार्ध बताया…उनका कीर्तन सुनकर सभी लोग तृप्त हो गए… तब श्री गोविंद  बुवा ने उधर उपस्थित लोगो को बोले…श्री महाराज को इधर आने की विनती करो… तब बंकटलाल और कुछ लोग श्री महाराज के पास जाकर उनको उधर आने के लिए  प्रार्थना करते है… लेकिन श्री महाराज नहीं आते… तब गोविंद  बुवा खुद श्री महाराज के पास आते है और उनको मंदिर आने के लिए विनंती करते है… आप स्वयंम  शिव स्वरुप है… कृपया आप शिव मंदिर में चलिए…आपके बिना मंदिर सुना  सुना है… मेरी पूर्व जन्म की कुछ तो पुण्य कर्म के कारण मुझे आपका दर्शन हुवा और आपके वाणी से कीर्तन का उत्तरार्ध सुनने को मिला…तब श्री महाराज ने उनकी तरफ देखा और बोले अरे लोगों  को बताते हो ” ईश्वर सर्वत्र है… अंदर बाहर ऐसा कुछ बह नहीं है… और खुद उस कीर्तन कथा के विरुद्ध बर्ताव कर रहे हो… लोगों  को एक बात बताते हो और खुद उसके अनुसार आचरण नहीं करते …औरों  जैस व्यवहारिक कीर्तन कार मत बनो… जावो कीर्तन समाप्त करो… मै  इधर बैठकर कीर्तन सुनता हु…गोविंद  बुवा व्यास पीठ पर आये और उन्होंने सभी को बताया की हम सभी नसीबवाले है… हमारे गांव में प्रत्यक्ष परब्रम्ह आये है… उनकी सेवा करो… हम सभी का कल्याण होगा…सभी ने एक साथ श्री गजानन महाराज का जयघोष किया।।। बोलो गजानन महाराज की जय

बोध – उपरोक्त लीला का बोध समझने की पात्रता दो… उपरोक्त लीला में श्री गोविंद  बुवा ने कीर्तन शुरू किया…वो बहोत बड़े कीर्तनकार थे उन्होंने पूर्वार्ध तो बताया लेकिन उत्तरार्ध बताते वक्त उनको क्या बताये यह समझ में नहीं आ रहा था… उसी वक्त श्री गजानन महाराज कीर्तन का उत्तरार्ध पूर्ण किया …ऐसा हमारे जीवन में भी बहोत बार होता है.. हम किसी समस्या में होते है.. और हम ईश्वर से प्रार्थना करते है। .. वस् वक्त हमें कोई आकर मदत कर जाता है…उसे ईश्वर ने ही हमारी साहयता के लिए  भेजा होता है… और हम कहते है.. भगवान् की तरह आकर आपने मेरी मदत की… लेकिन कुछ दिन बाद हम यह बात भूल जाते है… श्री गोविंद  बुवा श्री महाराज से कहते है आप शिव स्वरुप है कृपया मंदिर में चलिए…तब श्री महाराज उन्हें बोलते है आप कीर्तन में लोगों  बताते है की ईश्वर सर्वत्र है और आप ही यह बात भूल जा रहे हो… आप व्यवहारिक मत बनो… यहाँ श्री महाराज हमें बता रहे है मै  सर्वत्र हु… अमुक एक स्थल पर जावोगे तो ही मैं  मिलूंगा ऐसा नहीं है… यहाँ श्री महाराज यह भी बोध दे रहे है की अच्छी बाते सिर्फ लोगों  को बताने के लिए  नहीं होती पहले उसका अनुकरण हमने खुद करना चाहिए…इसके ऊपर जितना हम अधिक चितन मनन करेंगे उतना घर बोध श्री महाराज हमें देंगे

चलो श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है.. प्रार्थना श्री गजानन महाराज आप हमारी हर एक प्रार्थना की पूर्ति करते हो… जब आप हमारी इच्छा की पूर्ति करते हो उस वक्त हमारी श्रद्धा का स्तर  बहोत ऊँचा होता है… लेकिन कुछ दिन के बाद यह फिर  से कम हो जाता है… जिस तरह श्री गोविंद  बुवा जी को समझ  दी… वैसी समझ  हमें दो… हम में आध्यात्मिकता में जो व्यव्यहारिकता है वो दूर करो और हमें सच्ची समझ दो… जिससे है आपकी सच्ची भक्ति मिल जाए… धन्यवाद महाराज…यह प्रार्थना करवा लेने के लिए  धन्यवाद।।। श्री गजानन महाराज की जय !!!

 

गजानन महाराज चरित्र दर्शन 6

श्री महाराज इन्होंने भोजन किया पीताम्बर ने लाया हुवा पानी पिया उसके बाद श्री महाराज बंकट लाल को बोलते है..तुम्हारे जेब में जो सुपारी है वो दो हमको ..श्री महाराज ने ऐसे बोलते ही श्री बंकट लाल ने जेब से सुपारी निकालकर श्री महाराज को दी उसी जेब में..दो पैसे थे वो भी।उसने श्री महाराज को देने लगे…महाराज ने उसके तरफ देखा और हँसकर बोले..हमको।क्या व्यापारी समझते हो क्या? तुम्हारी व्यवहारिक बाते तुम्हारे पास ही रखो..हमे तो..भक्ति चाहिए.. वो तुम्हारे पास थी इसलिए तुम्हे दर्शन हुवा..जावो अब कीर्तन सुनो..यह सब सुनकर उसकी श्रद्धा और बढ़ गई…बोलो श्री गजानन महाराज की जय

बोध..उपरोक्त लीला दिखने में तो बहोत छोटी है लेकिन बहोत प्रेरणादायक है…श्री महाराज ने बंकटलाल को सुपारी मांगी..सुपारी बहोत कड़क होती है उसे खाने योग्य बनाने के लिये तोड़ना पड़ता है…तब हम उसे खा सकते है..हमारा मन भी उस सुपारी के जैसा है… जिसपर हतोड़ा मारना पड़ता है..तब हमारे मन में विश्वास ..श्रद्धा भक्ति बढ़ती है… सुपारी को निमित्त बना कर श्री महाराज ने श्री बंकट लाल की मन की चावी उनके पास ले ली है..उसके बाद बंकटलाल ने सुपारी के साथ पैसे भी श्री महाराज को देने का प्रयास किया तो श्री महाराज उन्हें बोले…यह व्यवहारिक चीजे नहीं चाहिए..हमें तो भक्ति चाहिए..यहाँ श्री महाराज हमें बहोत गहरी समझ दे रहे है..भगवान को हम कोई भौतिक वस्तु अर्पण करके भगवान की कृपा प्राप्त नही होती..कृपा प्राप्ती के लिए..हमारा अंतकरण का भाव शुद्ध होना चाहिए..जिससे हमारे मन में शुद्ध भक्ति के भाव प्रगट हो जाएंगी..और हमे बंकट लाल की तरह श्री महाराज का दर्शन और भक्ति प्राप्त होंगी..! चलो हम श्री महाराज से प्रार्थना करते है…,ब्रम्हांडनायका..हमारे तन..मन कि सफाई करो…शरीर की हर एक कोशिका को शुद्ध करो…हमारे मन में भी अनन्य भक्ति के भाव ,श्रद्धा और विश्वास को बढ़ावो..हमें आपकी सेवा के योग्य बनावो..है श्री गजानन मा ऊली यह प्रार्थना करवा लेने की लिए धन्यवाद… अंनत कोटि धन्यवाद.. बोलो श्री गजानन महाराज की जय!