हमारा संपूर्ण जीवन नियोजित है.. कब हमारा जन्म होगा कब मृत्यु यह हमारे हाथ में नहीं…. फिर भी हमें ऐसा लगता है की मैं कर्ता हु.. लेकिन उस वक्त हम यह नहीं सोचते की कब ये साँस बंद हो पता नहीं फिर भी हम यह सब भूल जाते है.. हमें यह भूलना नहीं है.. चलो हम स्वामी वाणी की कथा द्वारे इसे समझते है.. चोलप्पा के पुत्र कृष्णप्पा थे.. एक दिन अचानक कृषणपा की साँस बंद हो गयी सभी तरफ शोक मय वातावरण हो गया.. उसी वक्त उधर स्वामी महाराज आये और उन्होंने कहाँ.. नीलकंठा उठो अभी तक तुम्हारी शादी बाकि है.. उसी वक्त कृष्णप्पा की साँस शुरू हो गयी.. सभी लोग आश्चर्य हो गए.. बोलो श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय.. देखो उपरोक्त लीला हमें क्या सिखाती है.. हमारे मन बहोत से विचार आये रहे गे.. लेकिन हमें ईश्वर हर लीला का चिंतन मनन करके उसके ऊपर कार्य करना होता है.. लेकिन हमारा मन उस लीला में शंका निर्माण करता है.. हमें इस लीला से यही सीखना है की हमारा जीवन कब तक है हमे मालूम नहीं हमें सिर्फ हर एक कर्म ईश्वर सेवा समझ कर रहना है.
संदर्भ स्वामी वाणी
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