साढ़ेसाती यानी – हमारे उन्नति का राजमार्ग

शीर्षक पढ़कर आप बोलेंगे ये क्या बात कर रहे है… आज तक साढ़ेसाती यह शब्द सुनकर ही हमें डर लगता है और आप बोल रहे है… साढ़ेसाती यानी – हमारे उन्नति का राजमार्ग…अगर हमने किसी को पूछा की आपको साढ़ेसाती शुरू है क्या ? अगर वो आदमी तकलीफ में हो तो उसे साढ़ेसाती हो या ना हो… उसे मालुम हो या ना हो वो कहता है…हाँ मुझे बहोत तकलीफ है… साढ़ेसाती है… या कहेगा साढ़ेसाती है ऐसा लग रहा है… अगर आप उसे पूछेंगे की साढ़ेसाती का मतलब क्या ? तो बहोत से लोग इसका अर्थ नहीं बता सकते… सचमे साढ़ेसाती यानी क्या ? सचमें  साढ़ेसाती यानी समस्या है या हमारा परिपूर्ण विकास  का राजमार्ग है… इसके ऊपर आज हम थोड़ा चिंतन करेंगे…श्री शनि देव हर एक राशि से गोचर भ्रमण ( परिक्रमा ) करते है… यह समय ढाई साल का होता है… यानी जब वो हमारी राशि को आता है उससे पहले वो हमारी राशि के पहले  की राशि में  ढाई साल.. हमारी राशि में ढाई साल और हमारी आगे वाली राशि में ढाई साल ये सभी को जोड़ेगे तो यह कालावधि आता है उसे साढ़ेसाती कहाँ  जाता है… अब आपको साढ़ेसाती यानी क्या समझ में आया होगा…अब आपको एक बात बतानी है… श्री शनिदेव न्याय प्रिय ईश्वर  है..आप कहेंगे श्री शनि देव न्याय प्रिय है यानी क्या ? अब हम इसके ऊपर चिंतन मनन करते है… इससे हमें अनेक सवालों के जवाब प्राप्त होने वाले है… और हमें भी समझ में आएगा की साढ़ेसाती यानी क्या? हम जो भी कुछ काम कर रहे है वो अगर हम प्रामाणिकता से कर रहे है… वो काम करते वक्त हम किसी का भी नुकसान नहीं कर रहे है… फिर कितना भी बुरा समय हो… हम अपना कर्म प्रामणिकता से ईमानदारी से करे यह अपेक्षा श्री शनि देव की होती है… अगर हम कर्म करते वक्त अगर गलत रास्ते का इस्तेमाल करेंगे तो उसका फल हमें निश्चित प्राप्त होता ही है… फिर उस समय को साढ़ेसाती का समय भी हम मान सकते है… अगर हम हमारा कर्म ईमानदारी से नहीं करेंगे तो हमें साढ़ेसाती की तीव्रता का एहसास होने ही वाला है… अब आपको समझ में आया होगा की श्री शनिदेव न्याय प्रिय है… न्याय प्रिय यानी सिर्फ अच्छा  बर्ताव करना ही है क्या  ? सचमें जिनके जीवन में साढ़ेसाती आती है वह समय उनके लिए परिवर्तन का समय होता है.. फिर ये परिवर्तन अच्छा भी हो सकता है या बुरा भी हो सकता है… अच्छा  या बुरा यह सब हम पर निर्भर करता है… हमनें अपने मन को बताया की अब साढ़ेसाती का समय शुरू है… मेरी राशि को साढ़ेसाती है… इस वजह से मुझे बहोत तकलीफ हो रही है… ये साढ़ेसात साल कैसे जाएंगे पता नहीं… उसी वक्त न्याय प्रिय श्री शनिदेव बोलते तथास्तु…तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो… यानी हमारा नकारात्मक मन श्री शनिदेव की उपासना करना छोड़कर उन्हें ही के ऊपर टीका करता है… अब आप ही सोचो अगर आपको कोई बुरा कहे तो आपको अच्छा  लगेगा क्या ? नहीं ना ? फिर इस जगह हम न्याय प्रिय श्री शनिदेव के ऊपर ही टीका करते है… हमारा मन भी इसको सच मान लेता है… और आपको एक कहावत तो मालूम ही होंगी ..” शत्रु भी जो हमारे बारे में सोच नहीं सकता वह हमारा मन सोचता है” यानी इस कहावत के अनुसार हमें फल प्राप्त होता है… और हम नकारात्मक बन जाते है… और हमारा मन जाप करता है… साढ़ेसाती … साढ़ेसाती और इसी में फस जाता है.. और हमको सभी रास्ते बंद दिखने लगते है…और हमें बहोत ही तकलीफ होती है… फिर आपके मन में सवाल आ रहा होगा की क्या करे जिससे हमें साढ़ेसाती की तकलीफ न हो… हमारी प्रगति हो… सचमें साढ़ेसाती यानी हमारे यश का राजमार्ग है… किसी भी माँ- बाप को लगता है क्या की हमारा बालक पीछे रहे… वो गलत रास्ते  पर जाए…?  नहीं ना….  ? उसी तरह श्री शनिदेव को कैसे लग सकता है की मेरे भक्त पीछे रह जाए… नहीं ना …तो आज से.. इसी क्षण  से हमें अपने विचारों  में परिवर्तन करना है… उसे नकारात्मक नहीं सकारात्मक बनाना  है… अपने मन को बतावो…यह जो साढ़ेसाती आयी है ना… अब मेरे समृद्धि का समय शुरू होने वाला है.. शुरू हो रहा है… शुरू हो गया है… आज तक कर्म करते वक्त अनेक गलती या की है… वो गलतीया फिर से मत करो यह श्री शनिदेव हमें बता रहे है… जिस तरह घर बनाने से पहले नींव का मजबूत होना जरूरी है  नहीं तो वो इमारत गिर सकती है… उसी तरह साढ़ेसाती मुझे बता रही है… बेटा तुम्हारी नींव  मजबूत करो यानी पहले तुम्हारे मन को मजबूत बनावो…मन यह तुम्हारी जीवन की नींव है… अगर वो मजबूत हो गया तो… फिर साढ़ेसाती यानी जो भी साढ़ेसात साल है.. वो मेरे जीवन को बदलने के लिए  आये है… हर एक कर्म प्रमाणिकता से करो… शुरू शुरू में बहोत तकलीफ होंगी…क्यूंकि यह काम शाब्दिक नहीं है तो कार्मिक है… हर एक समस्या का सामना करते वक्त उस समस्या को धन्यवाद दो…श्री शनि महाराज को धन्यवाद दो… देखो हमारी जिंदगी बदल जायेगी…जीवन में चमत्कार दिखने लगेंगे…फिर कितनी बह तकलीफ हो… हमारे अंतर्मन से एक ही पुकार हमें सुनाई देंगी… धन्यवाद साढ़ेसाती… धन्यवाद श्री शनिदेव…हमारे जीवन में आने के लिए धन्यवाद !

चलो हम श्री शनि देव से प्रार्थन करते है… है श्री शनिदेव मुझे माफ़ करो… आज तक मुझे लगता था की… साढ़ेसाती यानी…श्री शनिदेव की वक्रदृष्टि ( अवकृपा )… लेकिन मुझे आज समझ में आया… साढ़ेसाती यानी ईश्वर ने मेरी प्रगति के लिए बनाया हुवा एक रास्ता है… एक पुकार है.. एक समय है… श्री शनिदेव आपकी वजह से ही तो में जागृत हुवा हु… मुझसे आपको अपेक्षित कर्म करके लो.. यह साढ़ेसात साल मेरा जीवन बदलने वाले बन जाए… और मेरा मन हमेशा सकारात्मक प्रतिसाद दे… धन्यवाद शनिदेव…मुझसे यह प्रार्थना करवा लेने के लिए धन्यवाद…यह प्रार्थना करवा लेने के लिए धन्यवाद

श्री गजानन महाराज दर्शन लीला 7

श्री बंकटलाल इन्होंने  अपने पिताजी श्री भवानी रामजी से श्री गजानन महाराज जी के बारे सबकुछ बताया और उनसे श्री महाराज को अपने घर पर ले आने की अनुमती  माँगी ..श्री भवानी रामजी ने उनको अनुमति दी… अब  श्री बंकटलाल जी उन्हें ढूंढने लगे… चार दिन के  बाद संध्या समय को उनको श्री गजानन महाराज जी का दर्शन हुवा…उन्होंने देखा की  गौ माता के बीच में श्री महाराज बैठे है… श्री बंकटलाल श्री महाराज के पास आये और उन्होंने उनको विनम्रता पूर्वक प्रणाम किया और श्रद्धा पूर्वक उन्होंने श्री महाराज को विनती की श्री महाराज आप हमारे घर चलिए..बहोत  कृपा होगी…श्री महाराज उनके घर जाने के लिए  राजी हो गए… बंकटलाल सूर्यास्त के वक्त श्री महाराज को अपने घर लेकर आये… श्री महाराज की तेजपुंजः मूर्ति देखकर श्री भवानी रामजी उनके चरणों में नतमस्तक हो गए.. उन्होंने उनकी स्तुति मय  प्रार्थना की… है प्रभो आप साक्षात सांब  सदाशिव है… प्रदोष समय आप आये है.. मै आपसे प्रार्थना करता हु.. आप हमारे घर पर भोजन ग्रहण कीजिए ..उन्होंने बिल्व पत्र  अर्पण कर उनकी पूजा की .. श्री भवानी राम ने श्री महाराज   को प्रार्थना तो की वो श्री महाराज ने स्वीकार भी कर ली पर यही भोजन तैयार नहीं था… भोजन बनने में समय लगने वाला था उनके मन में आया की… भोजन तैयार होने तक श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… उन्होंने सोचा क दोपहर का बनाया हुवा भोजन है… उसे हम ख़राब तो नहीं मान सकते … श्री महाराज भी इसका स्वीकार करेंगे… यह सोचेकर उन्होंने भोजन की थाली तैयार की …उसमे पूरी ..भाजी .. विविध फल… बादाम ..ऐसे वभिन्न पदार्थ उन्होंने श्री महाराज को भोजन  के लिए  लाए ..उनकी उन्होंने सर्वप्रथम श्री महाराज की पंचोपचार पूजा की और बाद में श्री महाराज को भोजन  करने के लिए श्री महाराज से प्रार्थना की… श्री महाराज ने भी बड़े प्रेम से वह भोजन स्वीकार किया …जो जो पदार्थ सभी श्री महाराज ने  खा लिए…. उस दिन श्री महाराज उन्हींके घर पर रहे…. बोलो श्री गजानना महाराज की जय

बोध –

ईश्वर हर एक लीला प्रेरणादाई होती है… जिससे के ऊपर अगर हम चिंतन मनन करेंगे तो… वह हमें हर एक समय मार्गदर्शन ही देती है… उपरोक्त लीला में श्री बंकटलाल जी की इच्छा तो बहोत थी की श्री महाराज को घर ले आने की… लेकिन उन्होंने सर्वप्रथम अपने पिताजी से अनुमति मांगी …यानी यहाँ हमें पितृ भक्ति की प्रेरणा यहाँ मिलती है… भगवान् कृपा के लिए  सर्वप्रथम हमारे घर में जो… मातृ- पितृ देव है उनकी सेवा करनी चाहिए तभी ईश्वर की भी कृपा होती है… श्री भवानीराम जी की भक्ति भी कितनी उच्चतम थी इसका हमें   दर्शन होता है… देखो भवानीराम जी की श्रद्धा और भक्ति कैसी  थी… जब श्री महाराज उनके घर आये वो समय सूर्यास्त का समय था… उस वक्त भोजन तैयार नहीं था… लेकिन श्री महाराज भोजन के लिए तैयार हुवे है…और अब ताजा  भोजन बनाने के वक्त लगेगा ..और इतने समय श्री महाराज नहीं ठहरेंगे तो… यह बात उनके मन में आयी इसलिए उन्होंने सोचै की दोपहर को जो भोजन बचा है वही श्री महाराज को भोजन के लिए दिया…इधर उनके मन श्री महाराज के प्रति श्रद्धा थी और मन विचार था की श्री महाराज हमारे घर से भूखे न जाये…कितनी उच्चतम श्रद्धा और भक्ति थी… श्री महाराज ने भी वह भोजन प्रेम से ग्रहण किया…यहाँ हमें बोध मिलता है की कोई भी हमारे घर से भूखा न जाए… उसी तरह हमारे भाव में अगर सच्चा पैन रहेगा तो ईश्वर हमारा हर एक प्रसाद ग्रहण करते ही है..  धन्यवाद महाराज कोटि कोटि धन्यवाद

चलो हम श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है- है महाराज आज आपने आजकी लीला के माध्यम से जो भी मातृ पितृ भक्ति की हमें समझ दी उसके लिए  धन्यवाद …हमको भी ऐसी भक्ति दो… हमसे भी अन्नदान हो इस पात्र हमें बनावो…जैसी कृपा  भवानीराम पर हुवी वैसी  हम पर भी करो… यह प्रार्थना करवा लेने के लिया धन्यवाद…कोटि धन्यवाद।

श्री गजानन महाराज की जय!

 

श्री सत्यनारायण पूजा- सच्ची समझ के साथ

श्री सत्यनारायण पूजा – सच्ची समझ के साथ

श्री सत्यनारायण पूजा हम लोग करते है लेकिन सचमे सत्यनारायण पूजा यानी क्या… इसमें सचमे क्या करते है… सच्ची सत्यनारायण पूजा कैसे करे… उसका फल हमें कैसे प्राप्त हो सकता है? ऐसे अनेक सवाल हमारे मन में रहते है…लेकिन और लोग करते है इसलिए हम भी पूजा करते है… लेकिन हमें उसका मन चाहा फल नहीं प्राप्त होता… तो चलिए आज जानते है सत्यनारायण पूजा के बारे में.. पहली बात तो यह है की सत्यनारायण की पूजा हम कभी भी कर सकते है… सत्यनारायण की पूजा मुख्यतः दिप पूजन … सूर्य पूजन … गणपति पूजन … शंख … घंटा पूजन …कलश पूजन … नवग्रह पूजन और श्री बालकृष्ण ( गोपाल कृष्ण ) की पूजा की जाती है और उसके बाद कथा श्रवण की जाती है… यह सबके ऊपर अगर आप खुद चिंतन मनन करेंगे तो हमको सत्यनारायण पूजा का सही मकसद समझ में आएगा… लेकिन हम उसके ऊपर चिंतन नहीं करते … इसमें पूजा तो सब करते है लेकिन उसके ऊपर चिंतन करेंगे तो… आपको पूरी सत्यनारायण पूजा का सार समझ में आएगा… प्रथम कथा में आता है… मन में जो भी इच्छा है उसकी पूर्ति के लिए कोनसा व्रत करना चाहिए तो इसमें सत्यनारायण व्रत के बारे में बताया है… कभी भी यह व्रत कर सकते है… इसमें प्रसाद के लिए सूजी, शक्कर, घी इसका प्रसाद बनाने को बताया है… यानि हमें सूजी जैसे अपने मन को साफ़ करना है…शक्कर जैसा हमारा स्वाभाव को मीठा बनान है और घी जैसे उस प्रसाद को स्वादिष्ट बनाता है उस तरह हमें अपना जीवन स्वादिष्ट बनाना है… दूसरे कथा में आता है एक ब्राम्हण सत्यनारायण पूजा का व्रत कर रहा था उस वक्त उधर से एक व्यक्ति उस रस्ते से जा रहा था उसे प्यास और भूख भी लगी थी…उस वक्त उस ब्राह्मण ने उसे पानी और भोजन दिया…और उस इस व्रत के बारे में बताया…यहाँ हमें बोध मिलता है की हमें प्यासे को पानी और भूखे को रोटी देनी चाहिए…यह समझ हमें दूसरी कथा से मिलती है… तीसरी कथा में एक राजा था उसे संतति नहीं थी…उसे सत्यनारायण की पूजा के बारे में पता चला तो उसने भगवान् से प्रार्थना की उसे अगर संतति हुवी तो वह यह व्रत करेगा…उसे संतति हुवी लेकिन उसने व्रत नहीं किया…उउसे लड़की हुवी थी …उसके शादी के वक्त यह व्रत करेंगे ऐसा बोलै … उस वक्त भी व्रत नहीं किया इसलिए उसे कठिनाई आये …यहाँ महत्वपूर्ण बात हमें जो समझनी है की हमें जब कोई समस्या होती है तो हम किसी से मदत मांगते है वह मदत भी करता है लेकिन जब हमारा काम हो जाता है तो हम उस व्यक्ति का एहसान भूल जाते है और बाद में जब तकलीफ आती है तो वह व्यक्ति हमें फिर से मदत कैसे करेगा… इसलिए यहाँ हमें हम जो भी एक दूसरे को आश्वासन देते है उसकी पूर्ति करने का यह कथा हमें सिखाती है …इस कथा में आता है की उस राजा को बहोत तकलीफ हुवी क्यूंकि उसने जो भी कुछ कहाँ तो उस तरह से वह बर्ताव नहीं किया यहाँ पूजा नहीं की यह संदर्भ है… लकिन यहाँ पर हमें चिंतन मनन करना है…चिंतन मनन करने पर हमें समझ में आता है की हमें मदत मिले इस लिए हम किसी को विनती करते है…उस वक्त अगर उसने हमें पैसे की मदत की हो और हमने उसे बोलै है की हम इतने दिन आपके वापस करेंगे तो वह हमें उसे दिया हुवा वचन की पूर्ति करनी है यानी सत्यवचन की पूर्ति … चौथी और पांचवी कथा में आता है की प्रसाद  न लेने से राजा की कन्या को एवं दूसरे एक राजा को तकलीफ हुवी … यहाँ हमें प्रसाद यानी अन्न का महत्व समझाया गया है… देखो खाली पेट हमारी बुद्धि काम नहीं करती … इसलिए हमें हमेशा जो भी अन्न … भोजन मिलता है उसका आदर करना है… उसका अपमान नहीं करना है… इस तरह होती है सच्ची सत्यनारायण पूजा… सत्यनारायण पूजा तो एक बहाना है … हमें सच्ची राह पर चलने को सिखाने का … अगर हम सत्य की राह पर चलेंगे तो हमारा हर एक दन श्री सत्यनारायण पूजा का होगा..फिर हम पूजा करे या ना करे श्री सत्यनारायण प्रभु तो जरूर हम पर भी कृपा करेंगे और हमारे साथ जो रहते है उनके ऊपर भी कृपा होंगी … लेकिन सिर्फ सत्यनारायण की पूजा करेंगे और तुरंत बाद औरों को तकलीफ देंगे तो हम कितनी भी पूजा करेंगे फिर भी सत्यनारायण प्रभु हम पर प्रसन्न नहीं हो सकते।।चलो हम सत्यनारायण प्रभु से प्रार्थना करते है। .. हे श्री सत्यनारायण प्रभु …हमें तो आपकी पूजा कैसी करनी है इसका ज्ञान तो नहीं है…लेकिन जो हम आपकी पूजा करते है …उससे हमें यह ज्ञान दो की हमारा हर एक कर्म सच्चा हो…कुछ भी हो हम सच्चाई की राह न छोड़े यह बुद्धि हमें दो…हमारे जीवन में सच्चे भाव प्रगट हो… हमारा जीवन सच्चाई से भर जाए …व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए हम सत्य का रस्ता न छोड़े…हमारा हर एक एक कर्म सत्य से भरपूर हो.. जिससे हर एक कर्म श्री सत्यनारायण की पूजा बन जाए… यह प्रार्थना करवा लेने के लिए धन्यवाद …कोटि कोटि धन्यवाद

नामस्मरण भक्ति – नवविधा भक्ति

नामस्मरण भक्ति – नवविधा भक्ति
इस भक्ति के बारे में समर्थ श्री रामदास स्वामी श्री दासबोध में कहते है – ” स्मरण देवाचे करावें | अखंड नाम जपत जावें | नामस्मरणें पावावें | समाधान | नित्य नेम प्रातः काळी | माध्यानकाळी सायंकाळी | नामस्मरण सर्वकाळी करत जावें |
नवविधा भक्ति का तीसरा प्रकार है… नामस्मरण भक्ति …यह भक्ति बहोत ही सरल भक्ति है.. इस भक्ति के लिए कुछ भी बंधन नहीं है… जिस भी भगवान् के ऊपर आपक श्रद्धा हो उस भगवान् की नामस्मरण रूपी भक्ति हम कर सकते है.. जैसे हमारी श्रद्धा ” भगवान् श्री कृष्ण पर है तो हम “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस मंत्र की नामस्मरण रूपी सेवा कर सकते है… अगर हमारी और किस भगवान् के ऊपर श्रद्धा उस भगवान् के नाम का कोनसा भी मंत्र का जप हम करा सकते है… बहोत से बार हमारे मन में सवाल निर्माण होता है की नाम रूपी सेवा कब करे ? उसके बारे में समर्थ कहते है… अखंड नाम जप की सेवा करनी चाहिए … नामरूपी सेवा में डूब जाना चाहिए…सुबह उठने के बाद…दोपहर को… रात को… ऐसे हर समय नामरूपी सेवा करनी चाहिए…इसके लिए कुछ बह बंधन नहीं है… हम जहाँ कहाँ भी है वहाँ आप नाम रूपी सेवा कर सकते है… इसके लिए कुछ भी साधनो की आवश्यकता नहीं लगती सिर्फ हमें इसमें निरंतरता रखनी है… यह भक्ति करने की सबसे आसान और सरल मार्ग है… जैसे हमारा श्वास चलता है उसी तरह हमारे जीवन नामरूपी सेवा चलनी चाहिए … इसके तो बहोत से लाभ है… लकिन कलियुग में ईश्वर के भक्ति का सबसे सरल और आसान मार्ग है नामस्मरण रूपी भक्ति…इसलिए हम सभी ने अपने जीवन में अपने मन को ईश्वर की नामरूपी भक्ति में डूब जाना है… हर रोज कमसे कम १ माला नाम रूपी सेवा करनी चाहिए… और इस तरह से हमारे जीवन में भक्ति बढ़ानी है !!

श्री गजानन महाराज दर्शन लीला 6

सभी लोग अब श्री गोविंद बुवा जी का कीर्तन सुनने के लिए  आये थे… श्री गजानन महाराज भी नीम  के पेड़ के पास बैठकर कीर्तन सुन रहे थे… श्री गोविन्द बुवा जी ने कीर्तन के लिए श्रीमद भागवत के एकादश स्कंध  का हंस गीता का श्लोक कीर्तन सेवा के लिए  लिया था… बुवा ने कीर्तन की पूर्वार्ध बताया … कीर्तन का उत्तरार्ध  करते वक्त उनको दिक्कत आने लगे तब… श्री महाराज ने सभी को कीर्तन का उत्तरार्ध बताया…उनका कीर्तन सुनकर सभी लोग तृप्त हो गए… तब श्री गोविंद  बुवा ने उधर उपस्थित लोगो को बोले…श्री महाराज को इधर आने की विनती करो… तब बंकटलाल और कुछ लोग श्री महाराज के पास जाकर उनको उधर आने के लिए  प्रार्थना करते है… लेकिन श्री महाराज नहीं आते… तब गोविंद  बुवा खुद श्री महाराज के पास आते है और उनको मंदिर आने के लिए विनंती करते है… आप स्वयंम  शिव स्वरुप है… कृपया आप शिव मंदिर में चलिए…आपके बिना मंदिर सुना  सुना है… मेरी पूर्व जन्म की कुछ तो पुण्य कर्म के कारण मुझे आपका दर्शन हुवा और आपके वाणी से कीर्तन का उत्तरार्ध सुनने को मिला…तब श्री महाराज ने उनकी तरफ देखा और बोले अरे लोगों  को बताते हो ” ईश्वर सर्वत्र है… अंदर बाहर ऐसा कुछ बह नहीं है… और खुद उस कीर्तन कथा के विरुद्ध बर्ताव कर रहे हो… लोगों  को एक बात बताते हो और खुद उसके अनुसार आचरण नहीं करते …औरों  जैस व्यवहारिक कीर्तन कार मत बनो… जावो कीर्तन समाप्त करो… मै  इधर बैठकर कीर्तन सुनता हु…गोविंद  बुवा व्यास पीठ पर आये और उन्होंने सभी को बताया की हम सभी नसीबवाले है… हमारे गांव में प्रत्यक्ष परब्रम्ह आये है… उनकी सेवा करो… हम सभी का कल्याण होगा…सभी ने एक साथ श्री गजानन महाराज का जयघोष किया।।। बोलो गजानन महाराज की जय

बोध – उपरोक्त लीला का बोध समझने की पात्रता दो… उपरोक्त लीला में श्री गोविंद  बुवा ने कीर्तन शुरू किया…वो बहोत बड़े कीर्तनकार थे उन्होंने पूर्वार्ध तो बताया लेकिन उत्तरार्ध बताते वक्त उनको क्या बताये यह समझ में नहीं आ रहा था… उसी वक्त श्री गजानन महाराज कीर्तन का उत्तरार्ध पूर्ण किया …ऐसा हमारे जीवन में भी बहोत बार होता है.. हम किसी समस्या में होते है.. और हम ईश्वर से प्रार्थना करते है। .. वस् वक्त हमें कोई आकर मदत कर जाता है…उसे ईश्वर ने ही हमारी साहयता के लिए  भेजा होता है… और हम कहते है.. भगवान् की तरह आकर आपने मेरी मदत की… लेकिन कुछ दिन बाद हम यह बात भूल जाते है… श्री गोविंद  बुवा श्री महाराज से कहते है आप शिव स्वरुप है कृपया मंदिर में चलिए…तब श्री महाराज उन्हें बोलते है आप कीर्तन में लोगों  बताते है की ईश्वर सर्वत्र है और आप ही यह बात भूल जा रहे हो… आप व्यवहारिक मत बनो… यहाँ श्री महाराज हमें बता रहे है मै  सर्वत्र हु… अमुक एक स्थल पर जावोगे तो ही मैं  मिलूंगा ऐसा नहीं है… यहाँ श्री महाराज यह भी बोध दे रहे है की अच्छी बाते सिर्फ लोगों  को बताने के लिए  नहीं होती पहले उसका अनुकरण हमने खुद करना चाहिए…इसके ऊपर जितना हम अधिक चितन मनन करेंगे उतना घर बोध श्री महाराज हमें देंगे

चलो श्री गजानन महाराज जी से प्रार्थना करते है.. प्रार्थना श्री गजानन महाराज आप हमारी हर एक प्रार्थना की पूर्ति करते हो… जब आप हमारी इच्छा की पूर्ति करते हो उस वक्त हमारी श्रद्धा का स्तर  बहोत ऊँचा होता है… लेकिन कुछ दिन के बाद यह फिर  से कम हो जाता है… जिस तरह श्री गोविंद  बुवा जी को समझ  दी… वैसी समझ  हमें दो… हम में आध्यात्मिकता में जो व्यव्यहारिकता है वो दूर करो और हमें सच्ची समझ दो… जिससे है आपकी सच्ची भक्ति मिल जाए… धन्यवाद महाराज…यह प्रार्थना करवा लेने के लिए  धन्यवाद।।। श्री गजानन महाराज की जय !!!