श्री सत्यनारायण पूजा- सच्ची समझ के साथ

श्री सत्यनारायण पूजा – सच्ची समझ के साथ

श्री सत्यनारायण पूजा हम लोग करते है लेकिन सचमे सत्यनारायण पूजा यानी क्या… इसमें सचमे क्या करते है… सच्ची सत्यनारायण पूजा कैसे करे… उसका फल हमें कैसे प्राप्त हो सकता है? ऐसे अनेक सवाल हमारे मन में रहते है…लेकिन और लोग करते है इसलिए हम भी पूजा करते है… लेकिन हमें उसका मन चाहा फल नहीं प्राप्त होता… तो चलिए आज जानते है सत्यनारायण पूजा के बारे में.. पहली बात तो यह है की सत्यनारायण की पूजा हम कभी भी कर सकते है… सत्यनारायण की पूजा मुख्यतः दिप पूजन … सूर्य पूजन … गणपति पूजन … शंख … घंटा पूजन …कलश पूजन … नवग्रह पूजन और श्री बालकृष्ण ( गोपाल कृष्ण ) की पूजा की जाती है और उसके बाद कथा श्रवण की जाती है… यह सबके ऊपर अगर आप खुद चिंतन मनन करेंगे तो हमको सत्यनारायण पूजा का सही मकसद समझ में आएगा… लेकिन हम उसके ऊपर चिंतन नहीं करते … इसमें पूजा तो सब करते है लेकिन उसके ऊपर चिंतन करेंगे तो… आपको पूरी सत्यनारायण पूजा का सार समझ में आएगा… प्रथम कथा में आता है… मन में जो भी इच्छा है उसकी पूर्ति के लिए कोनसा व्रत करना चाहिए तो इसमें सत्यनारायण व्रत के बारे में बताया है… कभी भी यह व्रत कर सकते है… इसमें प्रसाद के लिए सूजी, शक्कर, घी इसका प्रसाद बनाने को बताया है… यानि हमें सूजी जैसे अपने मन को साफ़ करना है…शक्कर जैसा हमारा स्वाभाव को मीठा बनान है और घी जैसे उस प्रसाद को स्वादिष्ट बनाता है उस तरह हमें अपना जीवन स्वादिष्ट बनाना है… दूसरे कथा में आता है एक ब्राम्हण सत्यनारायण पूजा का व्रत कर रहा था उस वक्त उधर से एक व्यक्ति उस रस्ते से जा रहा था उसे प्यास और भूख भी लगी थी…उस वक्त उस ब्राह्मण ने उसे पानी और भोजन दिया…और उस इस व्रत के बारे में बताया…यहाँ हमें बोध मिलता है की हमें प्यासे को पानी और भूखे को रोटी देनी चाहिए…यह समझ हमें दूसरी कथा से मिलती है… तीसरी कथा में एक राजा था उसे संतति नहीं थी…उसे सत्यनारायण की पूजा के बारे में पता चला तो उसने भगवान् से प्रार्थना की उसे अगर संतति हुवी तो वह यह व्रत करेगा…उसे संतति हुवी लेकिन उसने व्रत नहीं किया…उउसे लड़की हुवी थी …उसके शादी के वक्त यह व्रत करेंगे ऐसा बोलै … उस वक्त भी व्रत नहीं किया इसलिए उसे कठिनाई आये …यहाँ महत्वपूर्ण बात हमें जो समझनी है की हमें जब कोई समस्या होती है तो हम किसी से मदत मांगते है वह मदत भी करता है लेकिन जब हमारा काम हो जाता है तो हम उस व्यक्ति का एहसान भूल जाते है और बाद में जब तकलीफ आती है तो वह व्यक्ति हमें फिर से मदत कैसे करेगा… इसलिए यहाँ हमें हम जो भी एक दूसरे को आश्वासन देते है उसकी पूर्ति करने का यह कथा हमें सिखाती है …इस कथा में आता है की उस राजा को बहोत तकलीफ हुवी क्यूंकि उसने जो भी कुछ कहाँ तो उस तरह से वह बर्ताव नहीं किया यहाँ पूजा नहीं की यह संदर्भ है… लकिन यहाँ पर हमें चिंतन मनन करना है…चिंतन मनन करने पर हमें समझ में आता है की हमें मदत मिले इस लिए हम किसी को विनती करते है…उस वक्त अगर उसने हमें पैसे की मदत की हो और हमने उसे बोलै है की हम इतने दिन आपके वापस करेंगे तो वह हमें उसे दिया हुवा वचन की पूर्ति करनी है यानी सत्यवचन की पूर्ति … चौथी और पांचवी कथा में आता है की प्रसाद  न लेने से राजा की कन्या को एवं दूसरे एक राजा को तकलीफ हुवी … यहाँ हमें प्रसाद यानी अन्न का महत्व समझाया गया है… देखो खाली पेट हमारी बुद्धि काम नहीं करती … इसलिए हमें हमेशा जो भी अन्न … भोजन मिलता है उसका आदर करना है… उसका अपमान नहीं करना है… इस तरह होती है सच्ची सत्यनारायण पूजा… सत्यनारायण पूजा तो एक बहाना है … हमें सच्ची राह पर चलने को सिखाने का … अगर हम सत्य की राह पर चलेंगे तो हमारा हर एक दन श्री सत्यनारायण पूजा का होगा..फिर हम पूजा करे या ना करे श्री सत्यनारायण प्रभु तो जरूर हम पर भी कृपा करेंगे और हमारे साथ जो रहते है उनके ऊपर भी कृपा होंगी … लेकिन सिर्फ सत्यनारायण की पूजा करेंगे और तुरंत बाद औरों को तकलीफ देंगे तो हम कितनी भी पूजा करेंगे फिर भी सत्यनारायण प्रभु हम पर प्रसन्न नहीं हो सकते।।चलो हम सत्यनारायण प्रभु से प्रार्थना करते है। .. हे श्री सत्यनारायण प्रभु …हमें तो आपकी पूजा कैसी करनी है इसका ज्ञान तो नहीं है…लेकिन जो हम आपकी पूजा करते है …उससे हमें यह ज्ञान दो की हमारा हर एक कर्म सच्चा हो…कुछ भी हो हम सच्चाई की राह न छोड़े यह बुद्धि हमें दो…हमारे जीवन में सच्चे भाव प्रगट हो… हमारा जीवन सच्चाई से भर जाए …व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए हम सत्य का रस्ता न छोड़े…हमारा हर एक एक कर्म सत्य से भरपूर हो.. जिससे हर एक कर्म श्री सत्यनारायण की पूजा बन जाए… यह प्रार्थना करवा लेने के लिए धन्यवाद …कोटि कोटि धन्यवाद

नामस्मरण भक्ति – नवविधा भक्ति

नामस्मरण भक्ति – नवविधा भक्ति
इस भक्ति के बारे में समर्थ श्री रामदास स्वामी श्री दासबोध में कहते है – ” स्मरण देवाचे करावें | अखंड नाम जपत जावें | नामस्मरणें पावावें | समाधान | नित्य नेम प्रातः काळी | माध्यानकाळी सायंकाळी | नामस्मरण सर्वकाळी करत जावें |
नवविधा भक्ति का तीसरा प्रकार है… नामस्मरण भक्ति …यह भक्ति बहोत ही सरल भक्ति है.. इस भक्ति के लिए कुछ भी बंधन नहीं है… जिस भी भगवान् के ऊपर आपक श्रद्धा हो उस भगवान् की नामस्मरण रूपी भक्ति हम कर सकते है.. जैसे हमारी श्रद्धा ” भगवान् श्री कृष्ण पर है तो हम “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस मंत्र की नामस्मरण रूपी सेवा कर सकते है… अगर हमारी और किस भगवान् के ऊपर श्रद्धा उस भगवान् के नाम का कोनसा भी मंत्र का जप हम करा सकते है… बहोत से बार हमारे मन में सवाल निर्माण होता है की नाम रूपी सेवा कब करे ? उसके बारे में समर्थ कहते है… अखंड नाम जप की सेवा करनी चाहिए … नामरूपी सेवा में डूब जाना चाहिए…सुबह उठने के बाद…दोपहर को… रात को… ऐसे हर समय नामरूपी सेवा करनी चाहिए…इसके लिए कुछ बह बंधन नहीं है… हम जहाँ कहाँ भी है वहाँ आप नाम रूपी सेवा कर सकते है… इसके लिए कुछ भी साधनो की आवश्यकता नहीं लगती सिर्फ हमें इसमें निरंतरता रखनी है… यह भक्ति करने की सबसे आसान और सरल मार्ग है… जैसे हमारा श्वास चलता है उसी तरह हमारे जीवन नामरूपी सेवा चलनी चाहिए … इसके तो बहोत से लाभ है… लकिन कलियुग में ईश्वर के भक्ति का सबसे सरल और आसान मार्ग है नामस्मरण रूपी भक्ति…इसलिए हम सभी ने अपने जीवन में अपने मन को ईश्वर की नामरूपी भक्ति में डूब जाना है… हर रोज कमसे कम १ माला नाम रूपी सेवा करनी चाहिए… और इस तरह से हमारे जीवन में भक्ति बढ़ानी है !!

डॉक्टर – विट्ठल व्यंकटेश कामत – इडली से लेकर ऑर्चिड तक

डॉक्टर – विट्ठल व्यंकटेश कामत  इडली से लेकर ऑर्चिड  तक

नमस्कार आज हम डॉक्टर – विट्ठल व्यंकटेश कामत  जी की कहानी से प्रेरणा लेने वाले है।

 विट्ठल  कामत ये नाम आपने सभी सुना होगा या उनके होटल में खाना भी खाया होगा ।  आज जगत में सबसे बड़े होटल है इनके सचमे में क्या ये एक रात में हुवा क्याउन्होने क्या किया होगा इसके लिए आज इसके लिया हम उनके जीवन की घटना पढ़ते है… यह घटना हमको प्रेरणा देगी। वैसे तो उनका पूरा जीवन ही प्रेरणा दाई है ! जब उनकी उम्र १८ साल की थी तब वे लंडन जाने के बारे में उन्होंने अपने पिताजी से कहा मुझे सिर्फ जाने की लिए टिकिट दीजिये पिताजी बोले लेकिन तुम वापिस कैसे आवोगे। तब वो बोले मै  उधर जाकर कुछ करूँगा इस तरह से वो लंडन के लिए रवाना हो गएउधर जाने के बाद उन्होंने रहने के लिए भारतीय होटल का चयन किया उधर जाकर उन्होंने खाने के लिए इडली मंगाई वो इडली इस तरह की थी वो जैसे च्विंगम हो |   उस वक्त उन्होंने उस होटल के मालिक को बोले इससे अच्छी में आपको इडली बना के दे सकता हुवो बताते है की इससे पहले उन्होंने कभी इडली बनाई नहीं थी लेकिन जब उनकी माँ घर में इडली करती तो वो यह सब खुली आँख से देखते थे उन्होंने इडली बनाने कि सारी तैयारी की उसक वक्त वहाँ  एक लेडी आयी और उसने उनसे पूछा की आपको ईस्ट चाहिए क्या इन्होने बोल दिया मुझे ईस्ट नहीं चाहिएतब वो लेडी बोली आप यहाँ का जो भी ठंड मौसम है इसमें आप ईस्ट के बिना इडली नहीं बना सकते तब उन्होने ईस्ट के सिवाय इडली बनाई और वो ऐसी थी की कपास की तरह थी यह सब देखकर सभी अचंबित हो गए और उसी वक्त विट्ठल कामत उनको बोले की आठ दिन में आपको यह सब कुछ सीखा सकता हूँ अगर आप मुझे ५० पौंड देंगे और इस तरह उन्होंने सिर्फ ४५ घंटे में उन्होंने लंडन में ५० पौंड कमाए | इस तरह एक इडली वाले से लेकर आज ऑर्चिड  होटल तक की यात्रा जग में आज सबसे बड़ी होटल की चेन उनकी है उपरोक्त सच कहानी है जो हमे सीखती है की हमें हमेशा हमारी आँखे और कान खुले रखनी चाहिए तभी हम एक यशस्वी उद्योजक बन सकते है उनका तो संपूर्ण  जीवन यात्रा प्रेरणा देने वाली है लेकिन यहाँ एक बात भी हमें  प्रेरणा देती है वह हमें लेनी है |

विट्ठल कामत जी के प्रेरणात्मक विचार

१) अपने पसीने को इत्र बनावो |

२) खरीदार कितना भी बड़ो हो लेकिन तुम खुद कभी बेचो |

3) आने वाले हर एक ग्राहक भगवान् ही होता है |

 

स्टीव्ह जॉब्स – ऍपल Steve Jobs

आज हम देखने वाले है स्टीव्ह जॉब्स इनका चरित्र…. वैसे तो उनके बारे सभी जानते है फिर भी यहाँ हम उनका परिचय के माध्यम से प्रेरणा लेने का प्रयास करने वाले है… ऍपल बोले तो  स्टीव्ह जॉब्स यह सभी को मालूम है… लेकिन क्या आज हम जो इतनी बड़ी कंपनी देख रहे है वो क्या एक दिन में हुवी क्या….इसके लिए उसके जो संस्थापक है… वो क्या पहले से आमिर थे… चलो तो जानते है उनके बारे में… स्टीव्हन पॉल जॉब्स इनका  जनम फेब्रुवारी २४, इ.स. १९५५ सान फ्रान्सिस्को, कॅलिफोर्निया में हुवा था…उनकी माताजी का नाम जोअत्री सिम्पसन था… उनके माताजी ने उन्हें पॉल और क्लारा नामक पति पत्नी को गोद दे दिया…उन्होंने उसका पालन पोषण किया उसे अच्छी शिक्षा देने का प्रयास किया लेकिन कुछ कारण वश उसके कॉलेज की शिक्षा का खर्चा करने में वो असमर्थ रहे… इस वजह से स्टीव्ह को कॉलेज छोड़ना पड़ा आर्थिक स्थिति के कारण उनको खाना भी नहीं मिलता था… छोटे मोटे काम करके अपना गुजरा करते थे… उस वक्त उधर हफ्ते में एक बार भगवान श्री कृष्ण  के मंदिर में प्रसाद के रूप में भोजन मिलता था…इसके लिए वो ७ -८ किलोमीटर दूर चलकर  जाते थे…उसके बाद उन्होंने एक कंपनी में नौकरी शुरू की… वहाँ उनकी मुलाखत स्टीव वोझनीक से हुवी वो उनका बचपन का दोस्त था…उसके बाद ये दोनों दोस्तों ने मिलकर  कंप्यूटर बनाने की कंपनी शुरू करने का सोचा…और उन्होंने अपने घर पर ही यह काम शुरू किया…इसके बारे में ये भी कहाँ  जाता है की उन्होंने गैरेज में कंपनी शुरू की… इसी कंपनी का नाम ऍपल है… आगे जाकर बहोत स्ट्रगल किया और कंपनी बहोत बड़ी हो गई.. इतनी बड़ी हुवी की वो विश्व प्रसिद्ध हो गई… लेकिन ऐसा कुछ हो गया की स्टीव को उनकी ही कपंनी को छोड़ना पड़ा… सब कुछ ख़त्म हो गया ऐसा लग रहा था…उसके बाद उन्होंने दूसरी कंपनी शुरू की लेकिन उसमे भी उन्हें बहोत नुकसान हुवा… लेकिन वे हारे नहीं…उन्होंने नेक्स्ट कम्प्युटर नाम की कंपनी शुरू की ..इसमें उन्हें बहोत अच्छा यश प्राप्त हुवा…वह कंपनी ऍपल  जैसी बन गई.. कुछ सालो के बाद.. स्टीव और  ऍपल के बीच में चर्चा हुवी और उसके बाद नेक्स्ट कंपनी ऍपल में शामिल हो गई और उसके सीईओ स्टीव बन गए… उसके बाद ऍपल और प्रगति पथ पर जाने लगी…कंपनी ने आईपॉड ..आयट्यून बाजार में लेकर आये… इस तरह आज भी ऍपल  एक बड़ा ब्रांड है ये आप सब जानते है. ..ऐसे स्टीव को कैंसर हुवा था लेकिन वो घबराये नहीं …क्यूंकि वो हमेशा कहते थे की में रोज का दिन आखरी दिन है यह सोचकर काम करता हु… जीता हूँ.. ऐसे महान  उद्योजक का  5 ऑक्टोंबर 2011 निधन हो गया… !!!

उपरोक्त चरित्र में बहोत गहरी बाते है जिसे हम हमारे जीवन में आत्मसात कर सकते है… देखो पहली बात तो उनकी माँ ने उन्हें दूसरे माता पिता  को दिया क्यूंकि उनका जीवन अच्छा जाए… यहाँ हमें माँ क्या होती है इसकी समझ  मिलती है… उसके बाद उनके माता पिता  ने उन्हें सबकुछ देने का प्रयास किया पर… कॉलेज के शिक्षा वे दे नहीं पाए… स्टीव ने भी उसे स्वीकार किया और आगे चलते रहे…एक वक्त का खाना भी मिलने जैसी  उनकी परिस्थति नहीं थी… उनका संघर्ष शुरू ही था… उन्होंने शुरू की कंपनी से उन्हें नीकाला गया फिर वे हारे नहीं…और फिर से उसी कम्पनी के सीईओ बने… और आज कपनी एक उच्च स्थान पर है!!

आज की इस चरित्र से हमें पता चलता है की संघर्ष जितना बड़ा होता है… उतना बड़ा यश होता है!!

कठनाई आएगी लेकिन तुम अपना आत्मविश्वास मत खोना

 

जिस पर ध्यान देंगे वही मिलेगा

जिस पर ध्यान देंगे वही मिलेगा

 

आज हम एक ऐसी कहानी सुनेंगे जो हमें हमारे जीवन का लक्ष  कैसा हो यह बताएगी ! चलो तो आज सुनते है महाभारत की कहानी ! गुरु द्रोणाचार्य जी के पास अर्जुन और उनके भाई और बहोत से विद्यार्थी धनुर्विद्या सिख रहे थे ! उनकी शिक्षा  शुरू थी एक दिन  गुरु द्रोणाचार्य जी को लगा आज इन सबकी परीक्षा लेनी चाहिए ! उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया और बोले की आज हम परीक्षा लेंगे जिससे आपका कितना अभ्यास हुवा है यह समझ आएगा! उन्होंने पेड़ की ढाली को एक लकड़ी का   तोता बाँधा था और सभी को बोले की जो भी इस तोते की आँख पर निशाना साधेगा वो इस परीक्षा में सफल हो जायेगा ! सर्व प्रथम भीम आगे आया… उसने निशाना लगाया वो बाण छोड़ने ही वाला था उसी वकत गुरु द्रोणाचार्य जी उसे बोले पहले मुझे बतावो तुम्हे क्या दिख रहा है ?  भीम बोला मुझे..आकाश बादल ,सूर्य दिख रहा है…तब गुरु द्रोणाचार्य बोले तुम आँख नहीं भेद पावोगे ! अब युधिष्ठिर  आये उसने भी निशाना लगाया तभी  गुरु द्रोणाचार्य बोले बाण छोड़ने से पहले मुझे बतावो तुम्हे क्या दिख रहा है युधिष्ठिर बोले मुझे  आकाश बादल ,सूर्य ,पेड़ पेड़ की डहलिया !  युधिष्ठिर का गुरु द्रोणाचार्य बोले जबाब सुनकर  तुम आँख नहीं भेद पावोगे !  इस तरह बाकि सभी शिष्योंको  गुरु द्रोणाचार्य ने यही सवाल पूछा लेकिन सभी  ने भीष्म और युधिष्ठिर की तरह ही जबाब दिया अब आखरी में सिर्फ अजुर्न बचे थे अर्जुन आगे आये उन्होंने  धनुष्य में बाण लगाया तब गुरु द्रोणाचार्य बोले बाण छोड़ने से पहले मुझे बतावो तुम्हे क्या दिख रहा है तब अर्जुन बोले मुझे सिर्फ आँख दिख रह है बाकि कुछ भी नहीं दिख रहा… यह जबाब सुनकर गुरु द्रोणाचार्य खुश होकर बोले बाण चलावो ! गुरु की आज्ञा की अनुसार अर्जुन ने बाण छोड़ा और तोते की आँख को भेदा ! सभी ने तालिया बजाकर अर्जुन  का अभिनंदन  किया !

उपरोक्त कथा आपने अनेक बार पढ़ी होंगी सुनी होंगी लेकिन कोनसी भी कथा केवल पढ़ने या सुनने के लिए  नहीं होती तो उससे हमें जो बोध मिलता वह हमेशा हमारे जीवन में काम करता है ! देखो ना उपरोक्त कथा में हमें यह बोध मिलता है की अगर हमारा संपूर्ण  ध्यान अगर हमारे लक्ष पर होगा तो हमें जरूर यश प्राप्त होता ही है ! इसलिए सदा हमें हमारे लक्ष पर ही ध्यान रखना है !