नामस्मरण भक्ति – नवविधा भक्ति
इस भक्ति के बारे में समर्थ श्री रामदास स्वामी श्री दासबोध में कहते है – ” स्मरण देवाचे करावें | अखंड नाम जपत जावें | नामस्मरणें पावावें | समाधान | नित्य नेम प्रातः काळी | माध्यानकाळी सायंकाळी | नामस्मरण सर्वकाळी करत जावें |
नवविधा भक्ति का तीसरा प्रकार है… नामस्मरण भक्ति …यह भक्ति बहोत ही सरल भक्ति है.. इस भक्ति के लिए कुछ भी बंधन नहीं है… जिस भी भगवान् के ऊपर आपक श्रद्धा हो उस भगवान् की नामस्मरण रूपी भक्ति हम कर सकते है.. जैसे हमारी श्रद्धा ” भगवान् श्री कृष्ण पर है तो हम “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस मंत्र की नामस्मरण रूपी सेवा कर सकते है… अगर हमारी और किस भगवान् के ऊपर श्रद्धा उस भगवान् के नाम का कोनसा भी मंत्र का जप हम करा सकते है… बहोत से बार हमारे मन में सवाल निर्माण होता है की नाम रूपी सेवा कब करे ? उसके बारे में समर्थ कहते है… अखंड नाम जप की सेवा करनी चाहिए … नामरूपी सेवा में डूब जाना चाहिए…सुबह उठने के बाद…दोपहर को… रात को… ऐसे हर समय नामरूपी सेवा करनी चाहिए…इसके लिए कुछ बह बंधन नहीं है… हम जहाँ कहाँ भी है वहाँ आप नाम रूपी सेवा कर सकते है… इसके लिए कुछ भी साधनो की आवश्यकता नहीं लगती सिर्फ हमें इसमें निरंतरता रखनी है… यह भक्ति करने की सबसे आसान और सरल मार्ग है… जैसे हमारा श्वास चलता है उसी तरह हमारे जीवन नामरूपी सेवा चलनी चाहिए … इसके तो बहोत से लाभ है… लकिन कलियुग में ईश्वर के भक्ति का सबसे सरल और आसान मार्ग है नामस्मरण रूपी भक्ति…इसलिए हम सभी ने अपने जीवन में अपने मन को ईश्वर की नामरूपी भक्ति में डूब जाना है… हर रोज कमसे कम १ माला नाम रूपी सेवा करनी चाहिए… और इस तरह से हमारे जीवन में भक्ति बढ़ानी है !!
अरे नीलकंठा..उठ उठ !! आमच्या बरोबर दोन शब्द बोल!! संदर्भ स्वामी वाणी ३
कृष्णाप्पा हा चोळाप्पाचा मुलगा होता..त्यास महामारी रोग होऊन त्याचा मृत्यू झाला..तेव्हा घरातील सर्व मंडळी आक्रोशाने रडू लागली..तितक्यात स्वामी महाराज तेथे आले आणि बोलले “रडू नका ह्याचे लग्न व्हायचे आहे अजून .. अरे नीलकंठा..उठ उठ !! आमच्या बरोबर दोन शब्द बोल!! “ आणि...