नवविधा भक्ति का दूसरा प्रकार कीर्तन भक्ति…सचमें कीर्तन करना भी भगवद भक्ति में आता है यह हमारे लिए कितनी आनंददाई बात है… कीर्तन भक्ति यानी ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद से सबके साथ कीर्तन करना… अब हम पहले भक्ति में श्रवण करते है… जो भी कुछ श्रवण करते है… उससे अगर हमारी भगवद भक्ति बढ़ी होंगी तो…मनुष्य स्वभाव के अनुसार हम वह अच्छी बाते जरूर दूसरों के साथ शेयर करते है… उनको बताते है… यह बताना एक कीर्तन भक्ति का स्वरुप है… अभी देखो अगर हमें दुसरो को बाते बतानी है… तो उसके लिए हमारे पास ज्ञान होना चाहिए…यह ज्ञान तभी आयेगा जब हम ईश्वरीय गुणों का अभ्यास करेंगे…तभी हम दूसरों को ज्ञानवर्धक बाते बता सकते है… इसके लिए हमें अभ्यास करना होगा…अभ्यास करके उसके ऊपर चिंतन मनन करेंगे तो उससे…कीर्तन सेवा भी होंगी लेकिन हमारा भक्ति भाव भी बढ़ेगा…और यही मूल उद्देश्य है…हम सभी यह भक्ति कर सकते है… इसके लिए हमें क्या करना होगा? हमें हमारी जिस भी भगवांन के ऊपर श्रद्धा है उसके चरित्र का अभ्यास करना होंगा …उसके ऊपर चिंतन मनन करना होगा…जिससे हम कीर्तन रूपी भक्ति कर सकेंगे…इस भक्ति का महत्वपूर्ण फायदा यह है की हम में उस ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति भाव हमारे दिल में प्रगट होने में मदत होंगी।।।
जरूर आपकी जिस भी भगवान् के कर श्रध्दा है… उनके चरित्र का अभ्यास करो उसके ऊपर चिंतन मनन करके अपनी भक्ति बढ़ावो और बाकी लोगों की भक्ति बढ़ाने में निम्मित बनो!
आपको यह जानकारी कैसी लगी जरूर हमें बतावो… महत्वपूर्ण लगी तो औरों के साथ भी शेयर करो धन्यवाद !!
अरे नीलकंठा..उठ उठ !! आमच्या बरोबर दोन शब्द बोल!! संदर्भ स्वामी वाणी ३
कृष्णाप्पा हा चोळाप्पाचा मुलगा होता..त्यास महामारी रोग होऊन त्याचा मृत्यू झाला..तेव्हा घरातील सर्व मंडळी आक्रोशाने रडू लागली..तितक्यात स्वामी महाराज तेथे आले आणि बोलले “रडू नका ह्याचे लग्न व्हायचे आहे अजून .. अरे नीलकंठा..उठ उठ !! आमच्या बरोबर दोन शब्द बोल!! “ आणि...